कबीर के दोहे मीठी वाणी और साखी - Kabir ke Dohe or Sakhiyan in Hindi

कबीर के दोहे मीठी वाणी और साखी - Kabir ke Dohe or Sakhiyan in Hindi

संत कबीर न तो हिन्दू थे और न ही मुसलमान, वे तो बस एक शानदार व्यक्तित्व थे। इसी दुनिया के होने के बावजूद वे जाति-धर्म व दुनियादारी की अन्य बातों से परे थे। कबीर दास जी के दोहे (kabir ke dohe in hindi) हमें ज़िंदगी जीना सिखाते हैं, दुनिया की हर मुश्किल से लड़ने की ताकत देते हैं और दिल में भाईचारे और प्यार की भावना जगाते हैं। इस समय पूरा देश एक बेहद मुश्किल दौर से गुज़र रहा है। ऐसे में कबीर के दोहे (kabir doha) और कबीर का जीवन परिचय आपका संबल बढ़ाने के काम आ सकते हैं।

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    कबीर के दोहे साखी - Kabir ki Sakhiyan in Hindi

    संस्कृत शब्द ‘साक्षित’ (साक्षी) को हिन्दी में साखी कहते हैं। संस्कृत साहित्य में आंखों से प्रत्यक्ष तौर पर देखने वाले के अर्थ में साक्षी शब्द का प्रयोग किया जाता था। सबसे पहले कालिदास ने कुमारसंभव में इसी अर्थ में साखी का इस्तेमाल किया था। आधुनिक देसी भाषाओं में (खासतौर पर हिन्दी निर्गुण संतों में) यह प्रयोग संत कबीर (saint kabir) द्वारा किया गया था। उनके गुरुवचन और संसार को व्यावहारिक ज्ञान देने वाली रचनाओं को साखी (kabir ji ke dohe) के नाम से जाना जाता है। पढ़िए कबीर दास जी के दोहे साखी।

    1. पीछे लागा जाई था, लोक वेद के साथि।
    आगैं थैं सतगुरु मिल्या, दीपक दीया साथि।।
    अर्थ - इस दोहे के माध्यम से कबीर दास जी कहते हैं कि पहले वे जीवन में सांसारिक मोह माया में व्यस्त थे। लेकिन जब उनकी इससे विरक्ति हुई तो उन्हें सद्गुरु के दर्शन हुए। सद्गुरु के मार्गदर्शन में उन्हें ज्ञान रूपी दीपक मिला और उसी से उन्हें परमात्मा के महत्व का ज्ञान हुआ। यह सब कुछ गुरु की कृपा से ही संभव हुआ था। 
    2. तन कौं जोगी सब करैं, मन कौं विरला कोइ।
    सब विधि सहजै पाइए, जे मन जोगी होइ।।
    अर्थ - प्रस्तुत दोहे में संत कबीर का तात्पर्य है कि लोग बाहरी दिखावे के लिए साधु का रूप धारण कर लेते हैं मगर मन से वे साधु नहीं होते हैं। इसलिए हमें सिर्फ वेषभूषा से ही नहीं, बल्कि मन से भी साधु होना चाहिए। परमात्मा की प्राप्ति करने के लिए मन से साधु होना बेहद ज़रूरी होता है।

    3. परवति-परवति मैं फिरया, नैन गंवाये रोइ।
    सो बूटी पांऊ नहीं, जातैं जीवनि होइ।।
    अर्थ - इस दोहे के माध्यम से संत कबीर कह रहे हैं कि वे पर्वत-पर्वत घूमते रहे, रोते-रोते अपनी दृष्टि तक गंवा बैठे लेकिन उन्हें परमात्मा रूपी संजीवनी बूटी कहीं भी नहीं मिल सकी। इसी वजह से उनका जीवन अकारथ ही चला गया।
    4. कबीर बादल प्रेम का, हम पर बरष्या आइ।
    अंतरि भीगी आत्मां, हरी भई बनराइ।।
    अर्थ - इस दोहे में संत कबीर प्रेम का महत्व बता रहे हैं। उनके जीवन में प्रेम ने बादल के रूप में बारिश की थी। इस बारिश से उन्हें अपनी आत्मा का ज्ञान हुआ था। जो आत्मा उनके अंत स्थल में सोई हुई थी, वह जाग गई थी। उसमें एक प्रकार की नवीनता आ गई थी और उनका जीवन हरा-भरा हो गया था।
    5. अंखड़ियां झाईं पड़ी, पंथ निहारि-निहारि।
    जीभड़िया छाला पड़या, राम पुकारि-पुकारि।।
    अर्थ - इस दोहे में कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य की आत्मा अपने प्रेमी परमात्मा को प्राप्त करने के लिए दिन-रात बाट जोहती है। ऐसा करते-करते उसकी आंखें भी थक जाती हैं। अपने प्रेमी परमात्मा का नाम लेते-लेते उसकी जीभ में छाले पड़ जाते हैं। इसी प्रकार वह अपने परमात्मा रूपी प्रेमी राम को पुकारता रहता है।

    कबीर के दोहे मीठी वाणी - Kabir Das ki Vani

    कबीर के दोहे कई तरह के हैं (kabir ki vani)। यहां पढ़िए कबीर के दोहे मीठी वाणी।

    1. पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
        ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।
    अर्थ - कबीर दास जी के दोहे से समझ में आता है कि संसार की बड़ी-बड़ी पुस्तकें पढ़कर कितने ही लोग मृत्यु के द्वार तक पहुंच गए, मगर वे सभी विद्वान नहीं हो सके थे। वे कहते हैं कि इतन पढ़ने के बजाय अगर कोई प्रेम या प्रेम के ढाई अक्षर ही पढ़ ले यानी कि प्रेम के वास्तविक रूप को पहचान ले तो वह सच्चा ज्ञानी माना जाएगा।
    2. माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,
        कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।
    अर्थ - इस दोहे में संत कबीर कह रहे हैं कि लंबे समय तक हाथ में मोती की माला घुमाने से भी ज़रूरी नहीं है कि मन के भाव बदल जाएं या मन की हलचल शांत हो जाए। ऐसे में कबीर सलाह देते हैं कि हाथ की इस माला को फेरने के बजाय मन के मोतियों (भावनाओं) को बदलना चाहिए।

    3. बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि,
    हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।
    अर्थ - इस दोहे से कबीर दास जी का तात्पर्य है कि जो लोग सही तरीके से बोलना जानते हैं, उन्हें पता है कि बोली एक अनमोल रत्न है। इसीलिए वे हृदय के तराजू से तोलने के बाद ही अपने शब्दों को रचते हैं।
    4. अति का भला न बोलना, अति की भली न चुप,
        अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।
    अर्थ - इस दोहे में कबीर दास जी कहते हैं कि न तो बहुत अधिक बोलना अच्छी बात है और न ही ज़रूरत से ज्यादा चुप रहना ठीक रहता है। बिलकुल उसी तरह जैसे बहुत ज्यादा बारिश भी अच्छी नहीं और बहुत ज्यादा धूप भी ठीक नहीं रहती है।
    5. कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर, 
        ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर।
    अर्थ - इस दोहे के माध्यम से कबीर बता रहे हैं कि इस संसार में वे बस सबकी खैर चाहते हैं। वे मानते हैं कि अगर किसी से दोस्ती नहीं रख सकते हैं तो किसी के साथ लड़ाई भी न हो।

    कबीर दास जी के दोहे - Kabir Das ke Dohe in Hindi

    देशभर में कबीर दास जी के दोहे काफी प्रचलित हैं। स्कूल के बच्चों से लेकर हिन्दी साहित्य को विशेष तौर पर पढ़ने वाले स्टूडेंट्स तक, सभी को कबीर दास जी के दोहे पढ़ाए जाते हैं। जानिए संत कबीर के कुछ बेहद प्रचलित दोहे उनके हिन्दी अर्थों के साथ।

    1. बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलया कोय, 
        जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।
    अर्थ - इस दोहे में संत कबीर कह रहे हैं कि जब वे बुराई खोजने गए थे तो उन्हें कोई भी बुरा व्यक्ति या भाव नहीं मिला था। जब उन्होंने अपने दिल में ढूंढा तो पाया कि उनसे ज्यादा बुरा तो कोई था ही नहीं।
    2.  साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय,
         सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।
    अर्थ - प्रस्तुत दोहे में कबीर दास जी कह रहे हैं कि इस संसार को अनाज साफ करने वाले सूप जैसे सज्जनों की ज़रूरत है। ऐसे लोग जिन्हें सार्थक और निरर्थक के बीच के भेद का अंदाज़ा हो और वे सार्थक को संभालते हुए  निरर्थक को हटा सकें।

    3. जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान
        मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।
    अर्थ - किसी का बाहरी आवरण देखने के बजाय उसके ज्ञान को परखना चाहिए। अगर तलवार की ही बात करें तो तलवार का मूल्य होता है न कि उसे ढकने वाली म्यान का। 
    4. दोस पराए देखि करि, चला हसन्त हसन्त
        अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत।
    अर्थ - कबीर दास जी के दोहे का तात्पर्य है कि हम दूसरों के दोष देखकर हंसते रहते हैं। इस दौरान हम अपने उन दोषों या गलतियों को याद तक नहीं करते हैं, जिनकी न तो कोई शुरुआत है न ही अंत (यानी कि कोई हद ही नहीं है)।
    5. धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय
         माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय।
    अर्थ - प्रस्तुत दोहे में संत कबीर दास जी कहते हैं कि मन में धैर्य रखने से ही सब कुछ होता है। अगर कोई माली किसी पेड़ को सौ घड़े पानी से भी सींचता है, तब भी उस पेड़ में फल तो सही ऋतु आने पर ही लगेंगे।

    कबीर दास की अमृतवाणी - Kabir Amritwani

    कबीर दास जी के दोहों के साथ ही उनकी अमृतवाणी भी काफी लोकप्रिय हैं। उनकी अमृतवाणी (kabir das ki amritvani) से ज़िंदगी के फ़लसफ़े का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। वे ज़िंदगी की उलझी हुई समस्याओं को अपने अंदाज़ में बेहद आसान बना देते हैं। पढ़िए (kabir ki bani) कबीर दास की अमृतवाणी।

    1. माला फेरत जुग गया फिरा ना मन का फेर
    कर का मनका छोड़ दे मन का मन का फेर
    मन का मनका फेर ध्रुव ने फेरी माला
    धरे चतुरभुज रूप मिला हरि मुरली वाला
    कहते दास कबीर माला प्रलाद ने फेरी
    धर नरसिंह का रूप बचाया अपना चेरो
     
    2. चलती चाकी देखि के दिया कबीरा रोय
    दो पाटन के बीच में साबित बचा न कोय
    साबित बचा न कोय लंका को रावण पीसो
    जिसके थे दस शीश पीस डाले भुज बीसो
    कहिते दास कबीर बचो न कोई तपधारी
    जिन्दा बचे ना कोय पीस डाले संसारी

    3. आया है किस काम को किया कौन सा काम
    भूल गए भगवान को कमा रहे धनधाम
    कमा रहे धनधाम रोज उठ करत लबारी
    झठ कपट कर जोड़ बने तुम माया धारी
    कहते दास कबीर साहब की सूरत बिसारी
    मालिक के दरबार मिलै तुमको दुख भारी
     
    4. कबिरा खड़ा बाजार में सबकी मांगे खैर 
    ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर
    ना काहू से बैर ज्ञान की अलख जगावे
    भूला भटका जो होय राह ताही बतलावे
    बीच सड़क के मांहि झूठ को फोड़े भंडा
    बिन पैसे बिन दाम ज्ञान का मारै डंडा

    कबीर दास के भजन - Kabir Das Ke Bhajan

    कबीर के दोहा की तरह ही उनके भजन भी सर्व (kabir das ke bhajan) प्रसिद्ध हैं। उनके भजन (kabir das ji ke bhajan) बेहद आसान भाषा में हैं और उनके अर्थों को समझना भी मुश्किल (sant kabir ke bhajan) नहीं है। पढ़िए उनके कुछ प्रसिद्ध भजन।

    1. करम गति टारै
    करम गति टारै नाहिं टरी।। टेक।।
    मुनि वशिष्ठ से पंडित ज्ञानी सिद्धि के लगन धरि।
    सीता हरन मरन दसरथ को बनमें बिपति परी।।1।।
    कहं वह फन्द कहां वह पारधि कहं वह मिरग चरी।
    कोटि गाय नित पुन्य करत नृग गिरगिट-जोन परि।।2।।
    पाण्डव जिनके आप सारथी तिन पर बिपति परी।
    कहत कबीर सुनो भै साधो होने होके रही।।3।।
     
    2. दिवाने मन
    दिवाने मन भजन बिना दुख पैहौ।।टेक।।
    पहिला जनम भूत का पै हौ सात जनम पछिताहौ।
    कांटा पर का पानी पैहौ प्यासन ही मरि जैहौ।।1।।
    दूजा जनम सुवा का पैहौ बाग बसेरा लैहौ।
    टूटे पंख मंडराने अधफड प्रान गंवैहौ।।2।।

    3. रे दिल गाफिल
    रे दिल गाफिल गफलत मत कर
    एक दिन जम आवेगा।।टेक।।
    सौदा करने या जग आया
    पूजी लाया मल गंवाया
    प्रमनगर का अन्त न पाया
    ज्यों आया त्यों जावेगा।।1।।
    सुन मेरे साजन सुन मेरे मीता
    या जीवन में क्या क्या कीता
    सिर पाहन का बोझा लीता
    आगे कौन छुड़ावेगा।।2।।
    परलि पार तेरा मीता खडिया
    उस मिलने का ध्यान न धरिया
    टूटी नाव उपर जा बैठा गाफिल गोता खावेगा।।3।।
    दास कबीर कहे समुझाई
    अन्त समय तेरा कौन सहाई 
    चला अकेला संग न को
    किया अपना पावेगा।।4।।
     
    4. बीत गए दिन
    बीत गए दिन भजन बिना रे।
    भजन बिना रे भजन बिना रे।।
    बाल अवस्थ खेल गंवायो।
    जब यौवन तब मान घना रे।।
    लाहे कारण मूल गंवायो।
    अजहुं न गई मन की तृष्णा रे।।
    कहत कबीर सुनो भई साधो।
    पार उतर गए संत जना रे।।

    कबीर दास की रचनाएं - Kabir Das ki Rachnaye in Hindi

    कबीर दास जी ने हिन्दू-मुसलमान का भेद मिटाकर सिर्फ इंसान की रचना की। उन्होंने हिन्दू भक्तों और मुसलमान फकीरों के साथ सत्संग किया और दोनों ही धर्मों की अच्छी बातों को अपने जीवन में उतारा। संत कबीर अनपढ़ थे और उन्होंने कोई भी दोहा या ग्रंथ खुद नहीं लिखा था, बल्कि वे बस बोलते जाते थे और उनके शिष्य उनकी रचनाओं को लिखते थे। उनका मानना था कि संसार में सिर्फ एक ईश्वर है और वे पाखंड और कर्मकांड के भी विरोधी थे। वे मंदिर, मस्जिद, व्रत, रोज़ा, अवतार आदि को भी बिलकुल नहीं मानते थे। कबीर की वाणी का संग्रह ‘बीजक’ के नाम से मशहूर है, जिसके तीन भाग हैं -
    1. रमैनी
    2. सबद
    3. साखी

    कबीर दास जी पर लिखी गईं किताबों में आमतौर पर दोहा और गीतों का समूह होता है। उनकी कुछ महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध रचनाओं में रक्त, कबीर बीजक, सुखनिधन, सबद, साखी, मंगल, वसंत और होली अगम शामिल हैं। उनकी रचनाओं की शैली बेहद आसान, साधारण और सुंदर होती है। उनकी हर रचना का अपना महत्व है। उनकी वाणियों की तुलना भी किसी अन्य रचना से नहीं की जा सकती है।

    संत कबीर दास की जयंती

    हर वर्ष के ज्येष्ठ माह की शुक्ल पक्ष पूर्णिमा को कबीर जयंती मनाई जाती है। कबीर का जन्म संवत 1455 की ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा को हुआ था। इसीलिए इस दिन उनकी याद में पूरे देश में कबीर जयंती मनाई जाती है। 2020 में 5 जून, शुक्रवार को कबीर दास जी की जयंती मनाई जाएगी। इस दिन कुछ राज्यों में पब्लिक हॉलिडे की घोषणा कर दी जाती है। कबीर दास जी की जयंती के उपलक्ष्य में स्कूल-कॉलेज व साहित्यिक संगोष्ठियों में साहित्यिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। इस दिन बच्चे स्टेज पर उनके दोहे, भजन और कविताएं सुनाते व उनके पोस्टर बनाते हैं।

    कबीर दास का जीवन परिचय - Kabir Das ji ka Jeevan Parichay

    कबीर को भली-भांति जानने के लिए कबीर का जीवन परिचय जानना भी बेहद ज़रूरी है। भारत के महान संत और आध्यात्मिक कवि कबीर दास का जन्म वर्ष 1440 में हुआ था। इस्लाम के अनुसार ‘कबीर’ का अर्थ महान होता है। कबीर पंथ एक विशाल धार्मिक समुदाय है, जिन्होंने संत आसन संप्रदाय के उत्पन्न कर्ता के रूप में कबीर का परिचय दिया। कबीर पंथ के लोगों को कबीर पंथी कहा जाता है, जो पूरे उत्तर और मध्य भारत में फैले हुए हैं। संत कबीर की कुछ महान रचनाओं में बीजक, कबीर ग्रंथावली, अनुराग सागर, सखी ग्रंथ आदि शामिल हैं। यह स्पष्ट नहीं है कि उनके माता-पिता कौन थे लेकिन ऐसा सुना गया है कि उनकी परवरिश करने वाला कोई बेहद गरीब मुस्लिम बुनकर परिवार था। उनको नीरू और नीमा (रखवाला) ने वाराणसी के एक छोटे नगर में पाया  था। कबीर के मां-बाप बेहद गरीब और अनपढ़ थे लेकिन उन्होंने कबीर को पूरे दिल से स्वीकारा और खुद के व्यवसाय के बारे में शिक्षित किया। उन्होंने एक सामान्य गृह स्वामी और एक सूफी के संतुलित जीवन को जीया।

    कबीर बेहद धार्मिक व्यक्ति थे और आगे जाकर वे एक महान साधु बने। अपनी प्रभावशाली परंपरा और संस्कृति से उन्हें विश्व प्रसिद्धि मिली। माना जाता है कि अपने बचपन में उन्होंने अपनी सारी धार्मिक शिक्षा रामानंद नामक गुरु से ली थी और बाद में कबीर गुरु रामानंद के सबसे अच्छे शिष्य के तौर पर जाने गए।

    कबीरचौरा मठ मुलगड़ी संत-शिरोमणि कबीर दास का घर, ऐतिहासिक कार्यस्थल और ध्यान लगाने की जगह है। वे अपने प्रकार के एकमात्र संत हैं जो “सब संतन सरताज” के रूप में जाने जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि जिस तरह संत कबीर के बिना सभी संतों का कोई मूल्य नहीं है, उसी तरह कबीरचौरा मठ मुलगड़ी के बिना मानवता का इतिहास मूल्यहीन है। कबीरचौरा मठ मुलगड़ी का अपना समृद्ध परंपरा और प्रभावशाली इतिहास है। ये कबीर के साथ ही सभी संतों के लिए साहसिक विद्यापीठ है। मध्यकालीन भारत के भारतीय संतों ने इसी जगह से अपनी धार्मिक शिक्षा प्राप्त की थी। मानव परंपरा के इतिहास में ये साबित हुआ है कि गहरे चिंतन के लिए हिमालय पर जाना जरूरी नहीं है बल्कि इसी समाज में रहते हुए भी किया जा सकता है। कबीर दास खुद इस बात के आदर्श संकेतक थे। वे भक्ति के सच्चे प्रचारक थे, साथ ही उन्होंने आमजन की तरह साधारण जीवन भी लोगों के साथ जीया। पत्थर को पूजने के बजाय उन्होंने लोगों को स्वतंत्र भक्ति का रास्ता दिखाया। इतिहास गवाह है कि यहां की परंपरा ने सभी संतों को सम्मान और पहचान दी। सिलाई मशीन, खड़ाऊ, रुद्राक्ष की माला (रामानंद से मिली हुई), जंग रहित त्रिशूल और उनके द्वारा इस्तेमाल की गईं दूसरी सभी चीजें इस समय भी कबीर मठ में उपलब्ध हैं।

    कबीर दास की मृत्यु

    15वीं शताब्दी के सूफी कवि कबीर दास के बारे में ऐसा माना जाता है कि उन्होंने अपने मरने की जगह खुद से चुनी थी, मगहर, जो लखनऊ शहर से 240 किमी दूरी पर स्थित है। लोगों के दिमाग से मिथक को हटाने के लिए उन्होंने ये जगह चुनी थी। उन दिनों माना जाता था कि जिसकी भी मृत्यु मगहर में होगी, वह अगले जन्म में बंदर बनेगा और साथ ही उसे स्वर्ग में जगह भी नहीं मिलेगी। कबीर दास की मृत्यु काशी के बजाय मगहर में केवल इस वजह से हुई थी कि वे वहां जाकर लोगों के अंधविश्वास और मिथक को तोड़ना चाहते थे। 1575 विक्रम संवत में हिन्दू कैलेंडर के अनुसार माघ शुक्ल एकादशी के वर्ष 1518 में जनवरी के महीने में मगहर में उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा। ऐसा भी माना जाता है कि जो भी व्यक्ति काशी में मरता है, वह सीधे स्वर्ग में जाता है। इसी वजह से मोक्ष की प्राप्ति के लिए हिन्दू धर्म के लोग अपने अंतिम समय में काशी जाते हैं। एक मिथक को मिटाने के लिए कबीर दास की मृत्यु काशी के बाहर हुई। इससे जुड़ा उनका एक खास कथन है कि “जो कबीरा काशी मुएतो रामे कौन निहोरा” अर्थात अगर स्वर्ग का रास्ता इतना आसान होता तो पूजा करने की जरूरत ही क्या है।

    कबीर दास का शिक्षण व्यापक है और सभी के लिए एक समान भी क्योंकि वे हिन्दू, मुस्लिम, सिख व अन्य धर्मों में भेदभाव नहीं करते थे। मगहर में कबीर दास की समाधि और मज़ार दोनों हैं। कबीर की मृत्यु के बाद हिन्दू और मुस्लिम धर्म के लोग उनके अंतिम संस्कार के लिए आपस में भिड़ गए थे। लेकिन उनके मृत शरीर से जब चादर हटाई गई तो वहां कुछ फूल पड़े थे, जिसे दोनों समुदायों के लोगों ने आपस में बांट लिया था और फिर अपने-अपने धर्म के अनुसार कबीर जी का अंतिम संस्कार किया। समाधि से कुछ मीटर दूरी पर एक गुफा है, जो मृत्यु से पहले उनके ध्यान लगाने की जगह को इंगित करती है।