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जन्माष्टमी का महत्व और पूजा विधि – How to Celebrate Janmashtami in Hindi

Deepali PorwalDeepali Porwal  |  Jul 17, 2019
जन्माष्टमी का महत्व और पूजा विधि – How to Celebrate Janmashtami in Hindi

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पूरे देश में जन्माष्टमी के उत्सव को भगवान श्री कृष्ण के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है। कई जगहों पर इसे कृष्णाष्टमी भी कहते हैं। जन्माष्टमी का त्योहार पूरे भारत में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।
श्रीमदभागवत गीता में जन्माष्टमी के बारे में वर्णन है, कंस का वध करने के लिए जब भगवान विष्णु कृष्ण का रूप लेकर धरती पर आए तो उसी दिन को जन्माष्टमी के तौर पर मनाया जाने लगा। वासुदेव और देवकी के घर में भाद्र माह की अष्टमी पर मध्यरात्रि में कृष्ण का जन्म हुआ था। इसके बाद वासदुेव ने कंस के भय से कृष्ण को वृंदावन में यशोदा के घर पर छोड़ दिया था। तब से मथुरा और वृंदावन, दोनों को ही भगवान श्री कृष्ण का घर माना जाने लगा और जन्माष्टमी के अवसर पर यहां खूब रौनक होती है।
भारतीय त्योहारों में जन्माष्टमी की अपनी खास जगह है, इसे काफी बेहतरीन ढंग से और पूरे जोश और उल्लास के साथ देशभर में मनाया जाता है। ऐसे में श्री कृष्ण के पूजन से लेकर, मंदिर व घर की साज-सज्जा, पकवान और परिधान की तैयारी भी खूब ध्यान में रख कर की जाती है। तो आइये, आज आपको जन्माष्टमी से जुड़ी तमाम महत्वपूर्ण जानकारी से अवगत कराते हैं। 

जन्माष्टमी कब है

 

जन्माष्टमी भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव को ही कहा जाता है। पौराणिक ग्रंथों के मतानुसार श्री कृष्ण का जन्म का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र में मध्यरात्रि के समय हुआ था। अत: भाद्रपद मास में आने वाली कृष्ण पक्ष की अष्टमी को यदि रोहिणी नक्षत्र का भी संयोग हो तो वह और भी भाग्यशाली माना जाता है इसे जन्माष्टमी के साथ-साथ जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। 2021 में जन्माष्टमी का पावन त्योहार 30 अगस्त को मनाया जाएगा।
 
 

 

जन्माष्टमी पूजा विधि

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का त्योहार पारंपरिक तरीके से मनाया जाता है। इस दिन भक्त व्रत और पूजा-पाठ करते हैं। ऐसी मान्यता है कि यह त्योहार मनाकर हर मनोकामना पूरी की जा सकती है। कमज़ोर चंद्रमा वाले लोग इस दिन विशेष पूजा करके लाभ की प्राप्ति कर सकते हैं। इस खास दिन श्रीकृष्ण की पूजा करने से दीर्घायु, सुख-समृद्धि और संतान की प्राप्ति भी हो सकती है। कहा जाता है कि इस दिन व्रत करने से कई व्रतों का फल मिल जाता है। श्री कृष्ण जन्माष्टमी को सभी व्रतों का राजा यानि कि ‘व्रतराज’ भी कहा जाता है। इस दिन बाल गोपाल को झूला झुलाने से भी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। 
अष्टमी के उपवास से पूजन और नवमी के (तिथिमात्र) पारण से व्रत की पूर्ति होती है। व्रत रखने वाले भक्त को उपवास के पहले दिन लघु भोजन करना चाहिए। रात में जितेन्द्रिय रहें और उपवास के दिन प्रातः स्नान आदि नित्य कर्म करके सूर्य, सोम, यम, काल, संधि, भूत, पवन, दिक्पति, भूमि, आकाश, खेचर, अमर और ब्रह्मा आदि को नमस्कार करके पूर्व या उत्तर दिशा की ओर चेहरा करके बैठें। इसके बाद हाथ में जल, फल, कुश, फूल और गंध लेकर ‘ममाखिलपापप्रशमनपूर्वकसर्वाभीष्टसिद्धये श्रीकृष्णजन्माष्टमीव्रतमहं करिष्ये’ बोलते हुए संकल्प करें। 
मध्याह्न के समय काले तिलों के जल से स्नान करके देवकी जी के लिए ‘सूतिकागृह’ का स्थान नियत करें। उसे स्वच्छ और सुशोभित करके उसमें सूतिका के उपयोगी सारी सामग्री क्रम से रखें। सामर्थ्य हो तो गाने-बजाने का भी आयोजन करें। प्रसूति गृह के सुखद विभाग में सुंदर और सुकोमल बिछौने के लिए सुदृढ़ मंच पर अक्षतादि मंडल बनवा कर उस पर शुभ कलश स्थापित करें। उस पर ही सोना, चांदी, तांबा, पीतल, मणि, वृक्ष, मिट्टी या चित्र रूप (फोटो) की मूर्ति स्थापित करें। मूर्ति में प्रसूत श्री कृष्ण को स्तनपान कराती हुई देवकी जी हों और लक्ष्मीजी उनके चरण स्पर्श करते हुए हों-  ऐसा भाव प्रकट रहे तो सबसे अच्छा है। 
अंत में नीचे दिए गए मंत्र से देवकी मां को अर्घ्य दें।
प्रणमे देवजननीं त्वया जातस्तु वामन:।
वसुदेवात् तथा कृष्णो नमस्तुभ्यं नमो नम:।।
सपुत्रार्घ्यं प्रदत्तं मे गृहाणेमं नमोSस्तु ते।’
इसके पश्चात श्री कृष्ण को इस मंत्र के साथ पुष्पांजलि अर्पित करें।
‘धर्माय धर्मेश्वराय धर्मपतये धर्मसम्भवाय गोविन्दाय नमो नम:।’
पुष्पांजलि अर्पित करने के बाद नवजात श्रीकृष्ण के जातकर्म, नालच्छेदन, षष्ठीपूजन और नामकरण आदि करके ‘सोमाय सोमेश्वराय सोमपतये सोमसंभवाय सोमाय नमो नम:।’ मंत्र से चंद्रमा का पूजन करें। फिर शंख में जल, फल, कुश, कुसुम और गंध डालकर दोनों घुटने ज़मीन टेकें और इस मंत्र से चंद्रमा को अर्घ्य दें।
‘क्षीरोदार्णवसंभूत अत्रिनेत्रसमुद्भव।
गृहाणार्घ्यं शशांकेमं रोहिण्या सहितो मम।।
ज्योत्स्नापते नमस्तुभ्यं नमस्ते ज्योतिषां पते।
नमस्ते रोहिणीकान्त अर्घ्यं मे प्रतिगृह्यताम्।।’
चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद रात्रि के शेष भाग को स्त्रोत-पाठ आदि करते हुए व्यतीत करें। उसके बाद अगले दिन सुबह पुन: स्नान करके जिस तिथि या नक्षत्रादि के योग में व्रत किया हो, उसका अंत होने पर पारणा करें। यदि अभीष्ट तिथि या नक्षत्र के खत्म होने में देरी हो तो पानी पीकर पारणा की पूर्ति करें।

जन्माष्टमी भजन

श्री कृष्ण जन्माष्टमी के खास अवसर पर भक्त भजन संध्या का आयोजन करते हैं। अगर आप भी इस खास दिन पर कुछ भजन गाना चाहते हैं तो जन्माष्टमी पर भजन की यह लिस्ट आपके लिए है।
1. बता मेरे यार सुदामा रे, भाई घने दिनों में आया
बता मेरे यार सुदामा रे, भाई घने दिनों में आया.. 
बालक था रे जब आया करता रोज़ खेलकर जाया करता रे..
बालक था रे जब आया करता रोज़ खेलकर जाया करता रे..
हुई क्या तकरार सुदामा रे, भाई घने दिनों में आया
 बता मेरे यार सुदामा रे, भाई घने दिनों में आया।
2. अरे द्वारपालों कन्हैया से कह दो
दर पे सुदामा गरीब आ गया है,
भटकते-भटकते न जाने कहां से, 
तुम्हारे महल के
करीब आ गया है।
3. आना श्री भगवान हमारे हरि कीर्तन में
आना सुंदर श्याम हमारे हरि कीर्तन में
आना श्री भगवान हमारे हरि कीर्तन में…
आप भी आना संग राधा जी को लाना।
4. श्याम तेरी बंसी पुकारे राधा नाम
लोग करें मीरा को यूं ही बदनाम
सांवरे की बंसी को बजने से काम
राधा का भी श्याम..
वो तो मीरा का भी श्याम।
5. जय हो नन्द लाल की जय यशोदा लाल की
हाथी घोड़ा पालकी जय कन्हैया लाल की
जय हो नन्द लाल की जय यशोदा लाल की
हाथी घोड़ा पालकी जय कन्हैया लाल की
हे आनद उमंग भयो जय हो नन्द लाल की
नन्द घर आनन्द भयो जय कन्हैया लाल की

जानें जन्माष्टमी की तैयारी को लेकर पूछे गए सवाल और जवाब – FAQ’s

 

जन्माष्टमी की तैयारी को लेकर भक्तों के मन में तमाम तरह के सवाल होना आम बात है। जानिए अक्सर पूछे जाने वाले सवालों के जवाब।
1. 2020 में जन्माष्टमी का अवसर किस दिन मनाया जाएगा?
– 2020 में जन्माष्टमी का पावन अवसर 11 अगस्त को मनाया जाएगा। इस साल जन्माष्टमी का त्योहार मंगलवार के दिन मनाया जाएगा।
2. क्या इस दिन श्री कृष्ण के मंदिर जाना ज़रूरी है?
– अगर पूजा-पाठ के बाद समय बचता है और आप मंदिर जाना चाहते हैं तो उसमें कोई दिक्कत नहीं है। वैसे मंदिर जाना अनिवार्य नहीं है। यह पूजा आमतौर पर लोग अपने घरों में ही करते हैं। 
3. क्या कृष्ण जी के बाल स्वरूप की पूजा करना ज़रूरी है?
– जी हां, जन्माष्टमी का अर्थ है, श्री कृष्ण का जन्मोत्सव… इसमें उनके बाल स्वरूप की ही पूजा की जाती है। उन्हें झूला झुलाने को भी पूजा का अहम हिस्सा माना गया है.
4. श्री कृष्ण की पूजा करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
– श्री कृष्ण के साथ देवकी मां की पूजा करना काफी शुभ माना जाता है। उसके साथ ही यह भी ध्यान रखें कि इस दिन हंसी-मस्ती-खुशी के माहौल में भजन-कीर्तन करने से भी लाभ मिलता है।
5. क्या जन्माष्टमी में निर्जल व्रत ही रखना चाहिए?
जवाब: नहीं, ऐसा ज़रूरी नहीं है कि आप निर्जल व्रत ही रखें। अगर आपके अंदर निर्जला व्रत करने की शक्ति और क्षमता है, तभी करें वर्ना फलाहार करके भी व्रत रखा जा सकता है। श्री कृष्ण की पूजा में शरीर को कष्ट देना बिल्कुल जरूरी नहीं है। खासतौर से जो लोग बुजुर्ग हैं या किसी बीमारी से ग्रसित हैं।
6. जन्माष्टमी की पूजा में मुख्य रूप से प्रसाद के रूप में क्या चढ़ाया जाना चाहिए?
जवाब: भगवान कृष्ण को मक्खन से सबसे ज्यादा प्यार था इसलिए मक्खन का भोग तो ज़रूर लगाएं। इसके अलावा धनिये के लड्डू, आटे की पंजीरी, खसखस का हलवा भी प्रसाद के रूप में चढ़ाया जाता है।
7. नंद गोपाला को किस तरह के आभूषण और वस्त्र पहनाने चाहिए?
जवाब: भगवान कृष्ण की प्रतिमाओं और तस्वीरों से साफ जाहिर होता है कि उन्हें छोटी धोती पहनना, सिर पर मोर पंख और मुकुट, गले में मोतियों की माला, बांसुरी और गोटे वाले कपड़े पहनाए जाते थे। ऐसे में उन्हें ही मान कर आप भी भगवान कृष्ण का साज-श्रृंगार कर सकती हैं।
8. देशभर में जन्माष्टमी अलग-अलग अंदाज़ में मनाई जाती है। क्या दही-हांडी भी जन्माष्टमी का ही एक रूप है?
जवाब: जी हां, बिल्कुल, देशभर में जन्माष्टमी अलग अंदाज़ में मनाई जाती है। कहीं रंगों और होली से मनाई जाती है तो कहीं भजन-कीर्तन किये जाते हैं। महाराष्ट्र में दही-हांडी फोड़ने की परंपरा है, जहां टोलियों में सवार होकर लोग सड़कों पर निकलते हैं और फिर किसी एक स्थान पर दही-हांडी फोड़ते हैं।