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दशहरे पर कविता (2021) – Poem on Dussehra in Hindi

Supriya SrivastavaSupriya Srivastava  |  Oct 12, 2021
Poem on Dussehra in Hindi

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भारत तीज-त्योहारों का देश है। यहां हर त्योहार बड़े ही उत्साह और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। त्योहार चाहे छोटा हो बड़ा भारत के देशवासी उसे पूरे दिल से मनाते हैं। यहां हर त्योहार की अपनी अलग मान्यता है। इसी में से एक है दशहरा यानी विजयादशमी का त्योहार। दशहरा को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है।  भगवान श्री राम ने रावण का वध किया था और जगत को रावण नाम की बुराई से आजादी दिलवाई थी। उस दिन से लेकर आजतक दशहरा के दिन रावण का पुतला फूंक कर अच्छाई का जश्न मनाया जाता है। आपने अभी तक दशहरा के कोट्स या मेसेज तो बहुत पढ़े होंगे मगर अब पढ़िए दशहरा पर कविता हिंदी में (poem on dussehra in hindi)।

दशहरा पर कविता – Poem on Dussehra in Hindi

कहते हैं रावण से बड़ा ज्ञानी न तो कोई था और न ही आजतक कोई पैदा हुआ। मगर सर्वज्ञानी होने के बावजूद रावण के अहंकार ने उसे मिट्टी में मिला दिया। अपने अहंकार और मद में चूर होकर रावण ने माता सीता का छल से हरण कर लिया। बाद में माता सीता को रणव से आजाद कराने और बुराई का नाश करने के लिए भगवन श्री राम ने रामव का वध किया। इसी गाथा को सुनाती हुई पढ़िए दशहरे पर कविता (Poem on Dussehra in Hindi)।

Poem on Dussehra in Hindi

कविता-1

दशहरा का तात्पर्य, सदा सत्य की जीत।

गढ़ टूटेगा झूठ का, करें सत्य से प्रीत॥

सच्चाई की राह पर, लाख बिछे हों शूल।

बिना रुके चलते रहें, शूल बनेंगे फूल॥

क्रोध, कपट, कटुता, कलह, चुगली अत्याचार

दगा, द्वेष, अन्याय, छल, रावण का परिवार॥

राम चिरंतन चेतना, राम सनातन सत्य।

रावण वैर-विकार है, रावण है दुष्कृत्य॥

वर्तमान का दशानन, यानी भ्रष्टाचार।

दशहरा पर करें, हम इसका संहार॥

कविता-2 

किस्सा एक पुराना बच्चों, लंका में एक था रावण ,

उस अभिमानी रावण ने था, सबको खूब सताया, 

रामचंद्र जब आये वन में, सीता को हर लाया, 

झिल मिल झिल मिल सोने की, लंका पैरों पे झुकती, 

सुंदर थी लंका, लंका में सोना ही सोना था, 

तभी राम आये बंदर, भालू की सेना लेकर, 

साधा निशाना सच्चाई का, तीर चलाया

लोभ पाप की लंका धू धू जल कर राख हो गयी

दिए जलते तभी धरती पर, अगिनत लाखों लाख

इसलिए आज धूम हैं, रावण आज मारा था

काटे शीश दस दस बरी, उतरा भार धरा का

लेकिन सोचो की, रावण फिर ना छल कर पाए

कोई अभिमानी ना फिर, काला राज चलाये

तभी होंगी सच्ची दीवाली, होगा तभी दशहरा

जगमग जगमग होंगा जब, फिर सच्चाई का चेहरा !!

कविता- 3 

आज आ गया दशहरा का त्योहार,

जो लाता है सबके लिए खुशिया आपार।

इस दिन हुई थी बुराई पर अच्छाई की जीत,

तभी तो दशहरा है सच्चाई और भक्ति का प्रतीक।

इस दिन दिखती है सच्चाई की अभिव्यक्ति,

कयोंकि इस दिन दिखी थी सच्चाई की प्रचंड शक्ति।

लेकिन लोगो का हो गया है रुपांतरित विचार,

हर तरफ दिख रही बुराई तथा भ्रष्टाचार।

इस कलियुग में भी कम नही है राम का नाम,

ना जाने कैसे लोग करते है गलत काम।

इस दिन हुआ था राम राज्य का आरंभ,

पतन हुआ रावण का टूटा था उसका दंभ।

दशहरा पर अपने अंदर के रावण का करेंगे विनाश,

देश दुनियां में अच्छाई को फैलाने का करेंगे प्रयास।

तो आओ इस दशहरा पर मिलके ले यह प्रण,

बुराई का अंत करके अपनायेंगे हम अच्छा आचरण।

कविता-4

जानकी जीवन, विजय दशमी तुम्हारी आज है,

दीख पड़ता देश में कुछ दूसरा ही साज है।

राघवेन्द्र ! हमें तुम्हारा आज भी कुछ ज्ञान है,

क्या तुम्हें भी अब कभी आता हमारा ध्यान है ?

वह शुभस्मृति आज भी मन को बनाती है हरा,

देव ! तुम को आज भी भूली नहीं है यह धरा ।

स्वच्छ जल रखती तथा उत्पन्न करती अन्न है,

दीन भी कुछ भेट लेकर दीखती सम्पन्न है ।।

व्योम को भी याद है प्रभुवर तुम्हारी यह प्रभा !

कीर्ति करने बैठती है चन्द्र-तारों की सभा ।

भानु भी नव-दीप्ति से करता प्रताप प्रकाश है,

जगमगा उठता स्वयं जल, थल तथा आकाश है ।।

दुख में ही हा ! तुम्हारा ध्यान आया है हमें,

जान पड़ता किन्तु अब तुमने भुलाया है हमें ।

सदय होकर भी सदा तुमने विभो ! यह क्या किया,

कठिन बनकर निज जनों को इस प्रकार भुला दिया ।।

है हमारी क्या दशा सुध भी न ली तुमने हरे?

और देखा तक नहीं जन जी रहे हैं या मरे।

बन सकी हम से न कुछ भी किन्तु तुम से क्या बनी ?

वचन देकर ही रहे, हो बात के ऐसे धनी !

आप आने को कहा था, किन्तु तुम आये कहां?

प्रश्न है जीवन-मरन का हो चुका प्रकटित यहाँ ।

क्या तुम्हारे आगमन का समय अब भी दूर है?

हाय तब तो देश का दुर्भाग्य ही भरपूर है !

आग लगने पर उचित है क्या प्रतीक्षा वृष्टि की,

यह धरा अधिकारिणी है पूर्ण करुणा दृष्टि की।

नाथ इसकी ओर देखो और तुम रक्खो इसे,

देर करने पर बताओ फिर बचाओगे किसे ?

बस तुम्हारे ही भरोसे आज भी यह जी रही,

पाप पीड़ित ताप से चुपचाप आँसू पी रही ।

ज्ञान, गौरव, मान, धन, गुण, शील सब कुछ खो गया,

अन्त होना शेष है बस और सब कुछ हो गया ।।

यह दशा है इस तुम्हारी कर्मलीला भूमि की,

हाय ! कैसी गति हुई इस धर्म-शीला भूमि की ।

जा घिरी सौभाग्य-सीता दैन्य-सागर-पार है,

राम-रावण-वध बिना सम्भव कहां उद्धार है ?

शक्ति दो भगवन् हमें कर्तव्य का पालन करें,

मनुज होकर हम न परवश पशु-समान जियें मरें।

विदित विजय-स्मृति तुम्हारी यह महामंगलमयी,

जटिल जीवन-युद्ध में कर दे हमें सत्वर जयी ।।

——मैथिलीशरण गुप्त——
यहां पढ़ें हैप्पी नवरात्रि शायरी

कविता-5

विजयादशमी विजय का, पावन है त्योहार।

जीत हो गयी सत्य की, झूठ गया है हार।।

रावण के जब बढ़ गये, भू पर अत्याचार।

लंका में जाकर उसे, दिया राम ने मार।।

विजयादशमी ने दिया, हम सबको उपहार।

अच्छाई के सामने, गयी बुराई हार।।

मनसा-वाता-कर्मणा, सत्य रहे भरपूर।

नेक नीति हो साथ में, बाधाएं हों दूर।।

पुतलों के ही दहन का, बढ़ने लगा रिवाज।

मन का रावण आज तक, जला न सका समाज।।

राम-कृष्ण के नाम धर, करते गन्दे काम।

नवयुग में तो राम का, हुआ नाम बदनाम।।

आज धर्म की ओट में, होता पापाचार।

साधू-सन्यासी करें, बढ़-चढ़ कर व्यापार।।

आज भोग में लिप्त हैं, योगी और महन्त।

भोली जनता को यहां, भरमाते हैं सन्त।।

जब पहुंचे मझधार में, टूट गयी पतवार।

कैसे देश-समाज का, होगा बेड़ा पार।।

विजयादशमी पर कविता – 5 lines on Dussehra in Hindi

भगवान श्री राम को मर्यादा पुरुषोत्तम की उपाधि से नवाजा जाता है। उसके लिए धर्म ही सर्वोपरि था। हिंदू मान्यताओं के अनुसार धर्म की स्थापना के लिए ही भगवन विष्णु ने धरती पर श्री राम का अवतार लिया था। उन्होंने अपने पूरे जीवन में धर्म का पालन किया। रावण के वध के बाद अयोध्या में श्री राम और सीता का भव्य स्वागत किया गया। पढ़िए दशहरा की कहानी इन कविताओं की जुबानी (dussehra rhymes in hindi)। 

5 lines on Dussehra in Hindi

कविता-1

रावण शिव का परम भक्त था, बहुत बड़ा था ज्ञानी,

दस सिर बीस भुजाओं वाला, था राजा अभिमानी।

नहीं किसी की वह सुनता था, करता था मनमानी,

औरों को पीड़ा देने की, आदत रही पुरानी।

एक बार धारण कर उसने, तन पर साधु – निशानी,

छल से सीता को हरने की, हरकत की बचकानी।

पर – नारी का हरण न अच्छा, कह कह हारी रानी,

भाई ने भी समझाया तो, लात पड़ी थी खानी।

रामचन्द्र से युद्ध हुआ तो, याद आ गई नानी,

शिव को याद किया विपदा में, अपनी व्यथा बखानी।

जान बूझ कर बुरे काम की, जिसने मन में ठानी,

शिव ने भी सोचा ऐसे पर, अब ना दया दिखानी।

नष्ट हुआ सारा ही कुनबा, लंका पड़ी गँवानी,

मरा राम के हाथों रावण, होती खत्म कहानी।

कविता-2

आ गया पावन दशहरा, फिर हमे सन्देश देने

तुम संकटों का हो घनेरा, हो न आकुल मन ये तेरा

संकटो के तम छटेंगे, होगा फिर सुन्दर सवेरा

धैर्य का तू ले सहारा।

द्वेष कितना भी हो गहरा, हो न कलुषित मन ये तेरा

फिर ये टूटे दिल मिलेंगे, होगा जब प्रेमी चितेरा

बन शमी का पात प्यारा।

सत्य हो कितना प्रताड़ित, पर न हो सकता पराजित

रूप उसका और निखरे, जानता है विश्व सारा

बन विजय “स्वर्णिम सितारा”।

कविता-3

है सुतिथि सिर धारी विजय दशमी, है विजय सहचरी विजय दशमी।1।

कान्त कल कंठता दिखाती है, है कलित किन्नरी विजय दशमी।2।

सामने ला कला बहुत सुन्दर, है बनी सुन्दरी विजय दशमी।3।

पूत जातीय भाव पादप की, है विकच बल्लरी विजय दशमी।4।

एक अवतार प्रीति पूता हो, है धरा अवतरी विजय दशमी।5।

मंजु जातीयमान हिम कर की, है शरद शर्वरी विजय दशमी।6।

दूर कर बहु अभाव भारत का, भाव में है भरी विजय दशमी।7।

पा जिसे दुख उदधि उतर पाये, है रुचिर वह तरी विजय दशमी।8।

जो असुर-भाव में भरे से हैं, है उन्हें सुरसरी विजय दशमी।9।

जाति हित में शिथिल हुए जन की, है शिथिलता हरी विजय दशमी।10।

बहु पतन शील प्राणियों की भी, है परम हितकरी विजय दशमी।11।

कविता-4

अर्थ हमारे व्यर्थ हो रहे, पापी पुतले अकड़ खड़े हैं

काग़ज़ के रावण मत फूंकों, ज़िंदा रावण बहुत पड़े हैं

कुंभकर्ण तो मदहोशी हैं मेघनाथ भी निर्दोषी है

अरे तमाशा देखने वालों इनसे बढ़कर हम दोषी हैं

अनाचार में घिरती नारी हां दहेज की भी लाचारी

बदलो सभी रिवाज पुराने जो घर-घर में आज अड़े हैं

काग़ज़ के रावण मत फूँकों ज़िंदा रावण बहुत पड़े हैं

सड़कों पर कितने खर-दूषण झपट ले रहे औरों का धन

मायावी मारीच दौड़ते और दुखाते हैं सब का मन

सोने के मृग-सी है छलना दूभर हो गया पेट का पलना

गोदामों के बाहर कितने मकरध्वजों के जाल खड़े हैं

काग़ज़ के रावण मत फूंकों ज़िंदा रावण बहुत पड़े हैं

कविता-5

विजय सत्य की हुई हमेशा, हारी सदा बुराई है,

आया पर्व दशहरा कहता, करना सदा भलाई है.

रावण था दंभी अभिमानी, उसने छल -बल दिखलाया,

बीस भुजा दस सीस कटाये, अपना कुनबा मरवाया.

अपनी ही करनी से लंका, सोने की जलवाई है.

मन में कोई कहीं बुराई, रावण जैसी नहीं पले,

और अंधेरी वाली चादर, उजियारे को नहीं छले.

जिसने भी अभिमान किया है, उसने मुंह की खायी है.

आज सभी की यही सोच है, मेल -जोल खुशहाली हो,

अंधकार मिट जाए सारा, घर घर में दिवाली हो.

मिली बड़ाई सदा उसी को, जिसने की अच्छाई है

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