आपका ये प्रश्न स्वाभाविक है कि विशुद्ध लड़कियों की इस वेबसाइट पर यह लेख क्यों जो ना तो फ़ैशन के बारे में है ना ही घरेलू नुस्खे, ना ख़ूबसूरती और ना ही नई इग्ज़ॉटिक फ़ूड रेसिपी बनाने की विधि है इसमें ! तो मेरा सीधा सरल उत्तर है कि जिस समाज में हम रहते हैं वहां आधी आबादी स्त्रियों की है और इसलिए ही आधा सामाजिक उत्तरदायित्व भी है और आज इस देश में जब नित्य ही सामूहिक बलात्कार के समाचार आते रहते हैं तो इसमें कोई दो राय नहीं कि आज महिलाओं का अपने समाज के प्रति सामूहिक उत्तरदायित्व आवश्यक है ही !
इस पृथ्वी पर हमेशा से स्त्रियों की आधी आबादी रही है । प्रकृति हमेशा से 116 लड़कों को जन्म देती है तो 100 लड़कियों को क्योंकि सत्य तो यही है कि प्रकृति ने स्त्री को पुरुष से कहीं अधिक सक्षम बनाया है , कही अधिक समर्, सुस्वस्थ, बली व तेजस्वी बनाया है सदा से! प्रकृति में हर 116 लड़कों पर 100 लड़कियां इसलिए जन्म लेती है क्योंकि प्रकृति जानती है कि पुरुष इतना समर्थ नहीं और बड़े होते होते 6 लड़के अवश्य ही मर जाएंगे और आधा- आधा संतुलन या कहें कि अनुपात बराबर का बना रहे। नर में रजिस्टेन्स पावर यानि जीवन से लड़ने की ताक़त कम होती है और स्त्री को मां बनने के लिए प्रकृति ने मज़बूती से खड़ा किया है! वस्तुतः स्त्री में विलक्षण प्रतिभा है, झेलने की अद्भुत क्षमता है और इसीलिए वही ला सकती है सच में क्रांति, इसीलिए यह लेख इस वेबसाइट पर है !!
भारतीय इतिहास उठा कर देखिए तो त्रेता युग में सीता के लिए युद्ध लड़ा गया और द्वापर में द्रौपदी के लिए और आज कलियुग में इनसे भी एक बड़े युद्ध की जरूरत है समाज को क्योंकि कलयुग में रावण किसी समुद्र को पार नहीं करते, अब रावण घर- घर में पाए जा रहे हैं और अष्ट भुजा महिषासुर मर्दिनी को मानो ललकार रहे हैं कि आओ, मार सको तो मारो हमको! अब द्रौपदी के चीरहरण को पग- पग पर दुहशासन दुर्योधन खड़े मिलते हैं और बचाने कृष्ण आएंगे, आज यह मात्र कोरी कल्पना है जो फ़िल्मों में ही सम्भव हो तो हो, असल ज़िंदगी में नामुमकिन ही लगती है! निर्भया हो, ज्योति, मुन्नी या मीनाक्षी, नाम भले ही अलग हों, उम्र, शहर, गांव, गली क़स्बा, समय, दिन, वर्ष भले अलग अलग हों किंतु नियति सबकी वही रही! और हाल ही की 8 माह की अबोध बच्ची की रूह कंपा देने वाली घटना क्या समाज की चेतना को झकझोर देने के लिए काफ़ी नहीं? क्या अब एक बड़ा आंदोलन करने का उचित समय नहीं? क्या सभी महिला सशक्तिकरण व नारी मुक्ति आन्दोलनकारी संस्थाओं को एकछत्र, एक परचम के नीचे आ एक स्वर में इकठ्ठे हो एक कठोर प्रावधान की मांग नहीं उठानी चाहिए?
बच्चियां,बेटियां, लड़कियां, युवतियां, बहनें, भाभियां, मां, नंदें, देवरानियां, जेठानियां, सासु मां हर एक घर में रहती हैं! हर घर में पुरुष भी हैं, भाई पिता पति देवर जेठ ससुर किन्तु संस्कारों की अधोगति तो देखिए कि रक्षक ही भक्षक बन बैठें तो ऐसे समाज का क्या किया जाए? और बड़ा प्रश्न यह है कि आज भी पढ़ी लिखी, अपने पैरों पर खड़ी स्वावलंबी स्त्री भी ऐसी अबला, निर्बल क्यों है? क्यों चुपचाप निरन्तर अपना शोषण होने देने को बाध्य है? क्यों ‘लोग क्या कहेंगे ‘ के छद्म भुलावे में विष का हलाहल पान करती चली जाती है? क्यों स्त्रियां एक दूसरे के विरुद्ध खड़ी मिलतीं हैं जबकि असल लड़ाई तो पुरुष में बसी विकृत कामंधता से है? सो क्या आज उचित समय नहीं कि यह मांग उठाई जाए कि जैसे क्रूर दण्ड हमारे इतिहास में मिलते थे वही आदिम सजाएं क्यों न लागू की जाएं ऐसे अमानवीय अपराधों के लिये; जैसे अपराधी के शरीर को बीच चौराहे किसी गड्ढे में आधा दबा देना और बाक़ी के बचे शरीर यानि छाती, पीठ, कंधे, गर्दन, चेहरे व सिर पर गुड़ का लेप लगा कर छोड़ देना ! सार्वजनिक स्थान पर चींटियां, मक्खियां, कीट, बिल्लियां, चूहे, कुत्ते, कौव्वे, सब की सामूहिक दावत उफ़्फ़! कैसी कष्टप्रद भयंकर,धीमी व मंदगति की मृत्यु! क्या इस दण्ड की मात्र कल्पना ही अपराध करने से ना रोक देगी? क्या अपराधी का अंतर्मन सिहर ना जाएगा परिणाम सोच कर?
क्यों ना आज ऐसी कठोरतम सज़ा के प्रावधान की मांग को उठाया जाए जैसी खाड़ी के इस्लामिक देशों में है? कि पुरुष पराई स्त्री को देख भर लें तो कोड़े पड़ें या फिर बीच चौराहे पर फांसी या पत्थरों से मार- मार कर लहूलुहान करना ! चोरी की सज़ा यदि हाथ काट देना रही है तो क्या मेरी और आपकी अपनी व्यक्तिगत राय में तो बलात्कार का एकमात्र दण्ड होना चाहिए लिंग ही काट देना, ना रहेगा बांस और ना बजेगी बांसुरी।
आप भी इस विषय पर अपने विचार मुझसे साझा करें, मुझे प्रतीक्षा रहेगी…।
आख़िरकार यह पुरुष प्रधान समाज का नाटक बहुत हो गया! अब कुछ वर्ष, कुछ समय, कम से कम एक युग स्त्री के नाम भी हो ! अब समाज को स्त्री प्रधान बनना ही चाहिए !
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