सौतेले पिता को लेकर दीया मिर्जा का छलका दर्द, सालों बाद किया ये खुलासा

सौतेले पिता को लेकर दीया मिर्जा का छलका दर्द, सालों बाद किया ये खुलासा

बॉलीवुड एक्ट्रेस दीया मिर्ज़ा पिछले काफी दिनों से अपनी पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ को लेकर चर्चा में बनी हुई हैं। जहां एक तरफ फिल्म 'थप्पड़' में उनके काम को काफी सराहा जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ दीया कुछ समय पहले ही अपने पति और बिजनेसमैन साहिल संघा से अलग हुई हैं। अब हाल ही में दीया मिर्ज़ा ने अपने माता-पिता के अलगाव और सौतेले पिता के बारे में खुलकर बात की है। इस दौरान दीया ने अपने सौतेले पिता से संबंधित दर्द भी बयां किया।

हाल ही दिए एक इंटरव्यू के दौरान दीया मिर्जा ने अपनी निजी जिंदगी के बारे में ढेर सारी बाते कीं। उन्होंने अपने माता-पिता के अलगाव को लेकर कहा, "एक बच्चे के रूप में मुझे याद है कि मेरे माता-पिता दोनों किस तरह के संघर्ष कर रहे थे और एक साथ ना रहने का हल ढूंढ़ रहे थे। वह दोनों एक-दूसरे की बहुत देखभाल करते थे, वह एक-दूसरे से प्यार करते थे, लेकिन एक साथ नहीं रह सकते थे, क्योंकि वह ज़िंदगी से अलग-अलग चीजें चाहते थे और कभी-कभी, ऐसा होता है।”
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वहीं अपने सौतेले पिता के बारे में बात करते हुए दीया ने कहा, "मेरे सौतेले पिता उदाहरण पेश करने वाले इंसानों में से थे। उन्हें अपने पिता के रूप में स्वीकार करने में मुझे बहुत समय लगा लेकिन उन्होंने समझदारी दिखाते हुए पहले मेरे साथ दोस्ती की थी। 18 साल की उम्र में हैदराबाद छोड़ने और उनसे दूर जाने से ज्यादा किसी चीज ने मेरा दिल नहीं तोड़ा। मैंने जन्म देने वाले पिता को तब खो दिया जब मैं कुछ भी नहीं थी और मैंने 23 साल की उम्र में अपने सौतेले पिता को भी खो दिया। दोनों पुरुषों ने जीवन के प्रति मेरी समझ को काफी प्रभावित किया।"
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इस दौरान दीया मिर्ज़ा ने पहली बार अपने पति साहिल संघा से अलग होने पर भी खुलकर बात की। उन्होंने कहा, "मैं हैरान होती हूं, कई बार सर्कल में पढ़े-लिखे लोग होने के बाद भी वे आपको झूठे दिलासे देते हैं। सपोर्ट देने के नाम पर दिखावा करते हैं। लोग मुझसे पूछते हैं, तुम इतनी स्ट्रॉन्ग कैसे हो सकती हो? ऐसी स्थिति में भी काम करने कैसे जाती हो? 
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कई बार तलाक के साथ आपको सोसाइटी का प्रेशर भी झेलना पड़ता है। कई लोगों का मानना होता है कि तलाक इसलिए लिया जाता है क्योंकि आप दोनों ही आपसी सहमति से कुछ करना नहीं चाहते। हालांकि, कई बार सहमति से चलना भी पड़ता है, उन्हें अपनाना पड़ता है और कॉम्प्रोमाइज भी करना पड़ता है लेकिन कब तक? हम सिर्फ उम्मीद कर सकते हैं कि लोग हमारी राय की इज्जत करें और हमारे पर्सनल स्पेस और फैसले को अपनाएं।"
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