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#मेरा पहला प्यार – वो कच्ची उम्र का पक्का प्यार

Supriya Srivastava  |  Mar 27, 2018
#मेरा पहला प्यार – वो कच्ची उम्र का पक्का प्यार

यूं तो प्यार के कई नाम हैं। कोई इसे इश्क कहता है तो कोई मोहब्बत, किसी के लिए ये इबादत है तो किसी के लिए उसकी पूरी दुनिया। लोग कहतें है कि प्यार दर्द देता है, उससे दूरी ही भली। मगर मैं कहती हूं कि प्यार तो हर मर्ज की दवा है। जब हमारी जिन्दगी में प्यार होता है उस समय हम सबसे ज्यादा खुश होते है मगर जब वही प्यार हमारे पास नहीं होता तो हमें टूटने का, बिखरने का, दुखी होने का और दर्द का एहसास होता है। फिर हम दर्द देने का इल्जाम प्यार के ऊपर कैसे लगा सकते हैं। प्यार तो बस प्यार होता है। जो कभी किसी शायर की शायरी बन जाता है तो कभी ठंडी हवा का झोंका बन जाता है। कभी बारिश में भीगी हुई नरम घास बन जाता है तो कभी चाय की गरम प्याली बन जाता है। ये प्यार है, इसे परिभाषित करना इतना भी आसान नहीं, जितना लोग समझते हैं। इसको समझ पाना भी काफी मुश्किल है। खासतौर पर जब वो पहला प्यार हो, पहली बार किसी से नजरें मिली हों, पहली बार किसी के लिए दिल ज़ोरों से धड़का हो, पहली बार जिसको मिलकर बार-बार मिलने का दिल करे। बहुत मासूम होता है ये प्यार, कच्ची उम्र का पक्का प्यार। मेरा नाम अंकिता भार्गव है। ये कहानी मेरी कच्ची उम्र के उस पहले प्यार की है जिसकी खुशबू आज भी मेरी यादों में महक उठती है।  

बात उस समय की है जब मैं मसूरी के एक स्कूल में 12वीं क्लास पढ़ाई कर रही थी। वो हमारे फेयरवेल का दिन था जब नवीन ने पहली बार मुझसे खुद आकर बात की और हाय बोला। मेरे लिए ये किसी सपने से काम नहीं था। नवीन मेरा क्लासमेट था और बैकबेंचर भी। मैं पिछले 2 साल से उसे पसंद करती थी। वो हमेशा क्लास में टीचर्स को परेशान करता था। पढ़ाई करते तो शायद ही कभी मैंने उसको देखा हो। मगर उसके बाद भी वो क्लास में हमेशा सेकेंड पोजीशन में आता। क्योंकि फर्स्ट पोजीशन की गद्दी पर तो सिर्फ मेरा ही राज था। मैं एकदम पढ़ाकू किस्म की लड़की थी, चश्मिश बुलाते थे सब क्लास में मुझे। नवीन की शैतानियां, उसकी मस्तीखोरी मुझे हमेशा से ही बहुत पसंद आती। मगर वो तो इन सब से अनजान सिर्फ अपनी धुन में मस्त रहता था। फेयरवेल के दिन जब उसने मुझसे बात की तो मुझे समझ ही नहीं आया कि क्या जवाब दूं। थोड़ा हकलाते हुए मैंने भी उसे हाय कहा और यहींं से शुरू हुई हमारी दोस्ती।

कुछ समय बाद हम दोनों को ही दिल्ली के एक इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन मिल गया। घर और दोस्तों से दूर सिर्फ नवीन ही था, जिसे मैं जानती थी और जिसपर मैं विश्वास भी कर सकती थी। मगर दिल्ली आते ही न जाने नवीन को क्या हो गया। मैं उससे जितना बात करने की कोशिश करती, वो मुझसे उतना ही ज्यादा दूर भागता। यहां उसका एक नया ग्रुप बन गया था, जिसमें मेरे लिए कोई जगह नहीं थी। उसे शायद मेरे साथ रहने में शर्म महसूस होती थी। क्योंकि मैं अभी भी वही चश्मिश और पढ़ाकू टाइप की लड़की थी। मैं अक्सर दूर से उसे लोगों के साथ हंसी मज़ाक और मस्ती करते देखती मगर मेरे पास आते ही न जाने उसे क्या हो जाता। मैंने सोच लिया था कि इस बारे में नवीन से बात करके ही रहूंगी।

अगली रोज मैंने उसका हाथ पकड़ा और खींच कर उसे कैंटीन की तरफ ले गई। मैंने उससे पूछा कि क्यों कर रहा है वो मेरे साथ ऐसा। क्यों बात नहीं करता, क्यों कटा-कटा सा रहता है मुझसे। इन सवालों के बदले मिले जवाब ने मुझे जैसे तोड़ कर ही रख दिया। उसने मुझसे कहा कि कॉलेज में सभी पीठ पीछे मेरा मजाक उड़ाते हैं, मुझे चश्मिश और बहन जी बुलाते है। ऐसे में अगर उसने मुझसे बात की तो कॉलेज की कोई लड़की नवीन को घास नहीं डालेगी। मैं समझ नहीं पा रही थी कि मैं किससे बात कर रहीं हूं। उस नवीन से जो स्कूल में मासूम शरारतें किया करता था या फिर इस नवीन से मुझसे बात करने में भी शर्म महसूस करता है। मैंने उसी वक़्त फैसला कर लिया कि अब चाहे जो भी हो मैं नवीन से कभी बात नहीं करूंगी।

उस दिन के बाद से ही मैंने नवीन को अवॉयड कर पढ़ाई में मन लगाना शुरू कर दिया। इंजीनियरिंग के पहले साल का रिजल्ट आने पर पता चला कि मैंने टॉप किया है और नवीन का नाम लिस्ट में सबसे आखिरी था। वो मुझसे अपनी नज़रें ही नहीं मिला पा रहा था। ख़राब रिजल्ट की वजह से जो लड़कियां उसके साथ घूमती थीं, उन्होंने भी उससे बात करना बंद कर दिया था। मगर अब मेरा अपना ग्रुप बन चुका था। कॉलेज के लड़के मुझसे दोस्ती के बहाने नोट्स लिया करते। नवीन अकेला पड़ चुका था। एक दिन मौका देखकर उसने मुझसे बात करनी चाही, मगर इस बार मैंने उसे अवॉयड कर दिया और अपने नए दोस्तों में मस्त हो गई। मन ही मन मुझे उसके लिए बुरा फील हो रहा था, लेकिन जो उसने मेरे साथ किया उसे भूल पाना भी मेरे लिए मुश्किल था। समय बीतता गया और कॉलेज का दूसरा साल भी निकल गया। नवीन का रिजल्ट अब और भी खराब होने लगा था।

एक दिन अचानक उसने आकर मुझसे अपने किए की माफी मांगी। वो बस रोए जा रहा था। उसकी आंखों में पछतावा साफ़ नजर आ रहा था। उसने मुझसे कहा कि दिल्ली आकर वो इस चकाचौंध में भूल गया था कि सुंदरता सादगी में ही होती है और दोस्ती दिल से निभाई जाती है, दिखावे से नहीं। उसे अपनी गलतियों का एहसास था। वो चाहता था कि मैं सबकुछ भूलकर फिर से उसकी दोस्त बन जाऊं। मैं अभी भी मन ही मन उससे प्यार करती थी इसलिए मैंने उसे माफ कर दिया। उसके बाद हम दोनों ने मिलकर अगले दो साल तक पढ़ाई में बहुत मेहनत की और फाइनल ईयर में अच्छे नंबरों के साथ इंजीनियरिंग पूरी की। जिसके बाद हम दोनों को ही अलग-अलग कंपनी में जाॅब मिल गई।

आज 5 साल बाद हम दोनों अपनी-अपनी जिन्दगी में खुश हैं और बहुत अच्छे दोस्त भी हैं। मैं कभी उससे अपने दिल की बात नहीं कह पाई। मगर तसल्ली इस बात की है कि मुझे दोस्त के रूप में ही सही, लेकिन पुराना नवीन वापस मिल गया था। वो कभी नहीं समझ पाया कि मेरे दिल में उसके लिए क्या है। इस कहानी के जरिए मैं अपने दिल की बात नवीन को बताना चाहती हूं और उससे अपने प्यार का इजहार करना चाहती हूं। इस उम्मीद के साथ कि शायद वो मेरे जज्बातों को समझे और मेरे प्यार को अपनाकर मुझे भी अपना बना ले।

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