अगर बच्चा गोद लेने की सोच रहे हैं तो रखिए इन बातों का ख्याल

अगर बच्चा गोद लेने की सोच रहे हैं तो रखिए इन बातों का ख्याल

एक बच्चे की परवरिश में जो सबसे बड़ी और ज़रूरी चीज़ होती है, वह है उसे मिलने वाला प्यार और अपनापन। उसके बाद इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि जहां उसे ये सब मिल रहा है, वह उसे जन्म देने वालों की गोद है या फिर सिर्फ पालने वालों की। यही वजह है कि अगर आप किसी भी कारण से बच्चा गोद लेने की बात सोच रहे हैं तो कुछ मूल-भूत तथ्यों को समझ लें। इससे आपके इस फैसले को और भी मज़बूती मिल जाएगी।

बच्चा गोद लेने के टिप्स Tips for adopting a child In Hindi

अगर हम आजकल के समय की बात करें तो करियर शब्द ने लोगों की ज़िंदगी में एक नई जगह बना ली है। अब करियर का मतलब सिर्फ किसी के लिए नौकरी करना ही नहीं होता, बल्कि इसके साथ जुड़ा होता है अपना आत्मसम्मान, खुद पर भरोसा, अपनी पहचान और इन सब से भी बढ़कर खुद अपने पैरों पर, अपने दम पर खड़ा होकर कुछ कर दिखाना। ये बात महिलाओं और पुरुषों दोनों पर ही लागू होती है। इसके चलते अब लोग पहले की तरह शादी को ही एक बहुत बड़ी बात न समझकर जिंदगी का एक पड़ाव ही समझते हैं औऱ अपने करियर को भी भरपूर वक्त देते हैं। अब इन बातों के चलते देर से या बढ़ती उम्र में शादी करना कोई अनोखी बात नहीं रही। हां, दिक्कत बस ये है कि सपनों के पीछे भागती उम्र को हम तो नज़रअंदाज़ कर सकते हैं, शरीर नहीं करता।
लेट मैरिज के चलते कंसीव करने में होने वाली दिक्कतों का सामना करने वाले लोगों की संख्या बहुत बड़ी है। इससे हुआ ये है कि अब बच्चा गोद लेना कोई टैबू नहीं रहा। जो लोग भी अपने परिवार में बच्चा प्लान कर रहे हैं और किसी वजह से वे ऐसा नहीं कर पा रहे हैं तो पहले के मुकाबले बच्चा गोद लेने वालों की संख्या में काफी बढ़ोतरी हुई है। इसी के साथ-साथ ये भी सच है कि बच्चा गोद लेना एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। इससे जहां एक परिवार का अधूरापन पूरा होता है, वहीं एक बच्चे को भी अपनी जिंदगी के नए अर्थ मिलते हैं। ये बदलाव सुखद तो है, पर आसान दोनों के लिए ही नहीं है। चलिए फिर, आपकी इसी मुश्किल को हम अपने मनोवैज्ञानिक डॉक्टर समीर पारिख से मिले टिप्स के आधार पर आसान करने की कोशिश करते हैं।

सबसे पहले टटोलें मन

उसे सीने से लगाकर दूध पिलाना औऱ परवरिश देना आसान नहीं होता, जिसे कभी कोख ने न महसूस किया हो। ये बहुत ही कड़वा सच है, लेकिन गोद लिए बच्चे के साथ आप पूरी जिंदगी के लिए एक मजबूत बॉन्डिंग में बंध सकें, इसके लिए इस बेहद कड़वे सच का जवाब अपने-आप से पा लेना बहुत जरूरी है। यहां सवाल सिर्फ आपकी भावनाओं का ही नहीं है, बल्कि ये एक बच्चे की पूरी जिंदगी बदलकर रख देगा। ऐसा हर्गिज नहीं होना चाहिए कि आज आप भावनाओं का उफान महसूस कर या फिर अपनी गोद के सूनेपन को भरने के लिए बच्चा गोद तो ले लें, लेकिन कल लोगों की बातों से प्रभावित होकर या अपना खून न होने जैसी बातें सोचकर उसे पराया कर दें। ये भी मुमकिन है कि पहले अपना बच्चा न होने की स्थिति में आप किसी बच्चे को अडॉप्ट कर लें औऱ बाद में अगर किस्मत पलट जाए और आपकी गोद भी भर जाए तो उस बच्चे के साथ आपके रवैय्ये में बदलाव आने लगे। यही वजह है कि बेहद कड़वी होने के बावजूद हम पहली बात यही आपको कह रहे हैं कि अगर आप किसी बच्चे को अडॉप्ट करने वाले हैं तो हर हालात का ध्यान में रखकर अपना इरादा खूब पक्का कर लीजिए।

सच को छिपाएं नहीं

दूसरी बात, जब एक बार आप बच्चे को अडॉप्ट कर लें तो इस बात को बच्चे से छिपाने की कोशिश कभी मत कीजिए। अगर आपने बहुत ही छोटे बच्चे को अडॉप्ट किया है, यानी गोद लिया है तो सही समय आने, यानी थोड़ी उम्र बढ़ने के साथ ही, समझदारी से उसे इस सच से जोड़ दें। इसमें छिपाने जैसी कोई भी बात नहीं है। जिस बच्चे को आपने बेहद प्यार-दुलार दिया हो, अपने सीने से लगाकर रखा हो, लेकिन सिर्फ भावनाओं में बहकर उससे सच छिपाया हो तो याद रखिए कि ये बात किसी दूसरे के द्वारा सामने आने पर उसे ज्यादा बुरा लग सकता है। हो सकता है कि उसमें काफी बदलाव भी आ जाएं। ऐसा न हो, इसके लिए जरूरी है कि आप सच को सिर्फ सच ही रहने दें, झूठ बताकर झुठलाने की कोशिश न करें।

जरूरी नियमों की अनदेखी न करें

एक और अहम बात ये है कि जब भी बच्चा अडॉप्ट करें तो पूरी कानूनी प्रक्रिया औऱ नियमों का पालन करते हुए ऐसा कीजिए। चाहे आपने अपना बच्चा किसी जान-पहचान वाले से अडॉप्ट किया हो या फिर कहीं और से, इससे जुड़े जितने भी नियम-कायदे हैं, सभी को पालन पूरी तरह से कीजिए। 

परवरिश ही है सबसे ऊपर

हर बच्चे के लिए अहमियत सिर्फ इस बात की ही होती है कि उसकी परवरिश कैसी हो रही है, चाहे वह आपका बायोलॉजिकल बच्चा है या फिर अडॉप्टेड, इसलिए आप भी इस बात को ज्यादा अहमियत मत दीजिए औऱ पूरा ध्यान इस बात पर रखिए कि आप उस बच्चे को परवरिश और संस्कार कैसे दे रहे हैं। उसका ख्याल कितना रख रहे हैं।

बच्चे को सामान्य बनाएं, स्पेशल नहीं

हर बच्चे के लिए अहमियत सिर्फ इस बात की ही होती है कि उसकी परवरिश कैसी हो रही है, चाहे वह आपका बायोलॉजिकल बच्चा है या फिर अडॉप्टेड, इसलिए आप भी इस बात को ज्यादा अहमियत मत दीजिए औऱ पूरा ध्यान इस बात पर रखिए कि आप उस बच्चे को परवरिश और संस्कार कैसे दे रहे हैं। उसका ख्याल कितना रख रहे हैं।

बच्चे को सामान्य बनाएं, स्पेशल नहीं

अपनी परवरिश में इस बात को गहरे तक बिठा लीजिए कि आपने जिस बच्चे को अडॉप्ट किया है, उसे हर वक्त स्पेशल फील कराना जरूरी है। उसे अपने सामान्य बच्चा मानकर ही प्यार दीजिए, न बहुत कम औऱ न ही बहुत ज्यादा। याद रखिए, प्यार की कमी जहां सही विकास को प्रभावित करती है, वहीं इसकी अधिकता भी बच्चे के बिगड़ने में पूरी-पूरी भूमिका अदा करती है, इसलिए संतुलित रहिए। बच्चे को प्यार देते हुए भी हर वक्त उसे एक्ट्रा स्पेशल न फील कराएं और न ही हर वक्त सहानुभूति जताएं। बस समय को अपना काम करने दें।

समझें मनोविज्ञान भी

अडॉप्ट किए गए बच्चे की परवरिश में इस बात को ध्यान में रखिएगा कि ये बच्चे शुरुआत से ही अक्सर कुपोषण या कई तरह के संक्रमण आदि के शिकार हो सकते हैं। कई बार ऐसा होता है कि जन्म से पहले, यानी गर्भ काल में ही अपने माता या पिता की गलत आदतों के चलते ये कई तरह के नशे की चपेट में आ चुके होते हैं, क्योंकि उनके प्रति उपेक्षा बरती गई थी। इसके अलावा जन्म के बाद भी ऐसा अक्सर होता है कि उन्हें शुरुआत से ही उतना पोषण नहीं मिल पाता, जितना मिलना चाहिए। यहां तक कि बहुत कम उम्र में ही वे उपेक्षा, डांट-डपट, भूख-प्यास या मार-पीट का सामना कर चुके होते हैं। सो बहुत जरूरी है कि जब आप उनकी परवरिश का बीड़ा उठा लें तो नियमित रूप से उनका मेडिकल चैकअप करवाते रहें। अगर आपको उस बच्चे के व्यवहार की कोई बात अजीब लगती है तो किसी मनोचिकित्सक से तुरंत सलाह लेने में देर न करें। 

प्यार करना ही नहीं, जताना भी जरूरी

छोटे बच्चों के साथ तो ये स्थिति होती है कि वे जिस गोद में प्यार पाते हैं, तुरंत उसी के ही हो जाते हैं, लेकिन बच्चा अगर बड़ा है तो उसकी परवरिश में आपको थोड़ा ज्यादा ध्यान देना होगा। ये तो सच ही है कि आप उसे प्यार करते हैं, तभी तो उसे अपनाया है। जरूरत सिर्फ प्यार करने भीर की ही नहीं, बल्कि उसे जताने की भी है। समय-समय पर बच्चे के सिर पर हाथ रखें, उसे गले लगाएं, पुचकारें, लाड़-प्यार जताएं। याद रखिए, ये प्यार औऱ घर को तरसा हुआ बच्चा है। उसे अपनी इस बदली हुई स्थिति का विश्वास धीरे-धीरे आपके प्यार औऱ बर्ताव के आधार पर ही होगा। 

बच्चे को दीजिए अपनेपन का अधिकार

बच्चे को एकदम नॉर्मल रहने दीजिए और उसे वे सारे हक दीजिए, जो आपका बच्चा होने के नाते उसका अधिकार है, जैसे- रूठना, ज़िद करना, नाराज़ होना वगैरह। हां, सावधानी सिर्फ इस बात की रखनी है कि उसकी ज़िद को एक हद तक ही ज़िद रहने देना है। उसे एक बुरी आदत या टेकन फॉर ग्रांटेड जैसी स्थिति में नहीं बदलने देना है। 

कुछ गलतियां नजरअंदाज भी करें

अडॉप्ट करने के कुछ समय तक बच्चे की ज्यादातर गलतियों को नजरअंदाज ही कीजिए, क्योंकि अभी उसमें आत्मविश्वास की भारी कमी है। साथ ही वह मन के किसी कोने में अभी भी सहमा हुआ है। उसे अनुशासन के नाम पर अभी से बहुत ज्यादा नियम-कायदों से न घेरें।

महसूस कराएं हर रिश्ता

बच्चे को सभी रिश्तों से जोड़िए। आपके नाते-रिश्तेदार, मिलने-जुलने वाले सभी का प्यार उसे मिलना जरूरी है, क्योंकि सीमित दुनिया तो वह पहले ही देखकर आया है। अब उसकी दुनिया को विस्तार लेने दीजिए। उसके नए दोस्त बनाने में भी उसकी मदद कीजिए, लेकिन साथ ही अपनी नजर भी उस पर बनाए रखें, ताकि किसी का ताना-उलाहना उसे आहत न कर दे। इसके लिए उसे मानसिक रूप से तैयार रखें।

मजबूती को चाहिए समय

बच्चे सिर्फ बच्चे होते हैं और उन्हें वही रहने दें। जहां तक रही अपने रिश्ते की मजबूती की बात तो उसे थोड़ा समय दें। आपने अभी तो एक पौधा भर लगाया है, उसे पेड़ बनाने में आपकी परवरिश और वक्त को भी अभी वक्त लगेगा।
(ये लेख जाने-माने मनोवैज्ञानिक डॉक्टर समीर पारिख से बातचीत पर आधारित है।)

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