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#मेरा पहला प्यार - उसकी चाहत को ही गलत समझ बैठी

#मेरा पहला प्यार - उसकी चाहत को ही गलत समझ बैठी

जब प्यार हमारी जिंदगी में आता है तो मायूसी के बादल कब छट जाते हैं पता ही नहीं लगता। इस बार ‘मेरा पहला प्यार’सीरीज में हम आपको बता रहे हैं एक ऐसी ही लव स्टोरी के बारे में, जिसके प्यार ने उसे आगे बढ़ने की और जिंदगी में कुछ कर दिखाने के लिए उकसाया। पढ़िए नाजिया के पहले प्यार की कहानी, उसी की जुबानी..


मेरा नाम नाजिया है और मैं अलीगढ़ शहर की रहने वाली हूं। बाहरवीं की पढ़ाई खत्म होते ही मैंने कॉलेज में दाखिला लिया। तब से मैंने जाना कि जिंदगी क्या होती है और इंजॉय करना क्या होता है। बचपन से ही प्यार के लिए तरसती आई हूं। मैंने अपने घर में हमेशा नफरत और लड़ाई- झगड़े ही देखे हैं। मैं जब 12 साल की थी तभी मेरे मम्मी- पापा ने एक- दूसरे से अलग रहने का फैसला कर लिया था और मुझे भी दो हिस्सों में बांट दिया गया। मैं कुछ दिन पापा के पास और कुछ दिन मम्मी के पास रहती। शायद मेरी किस्मत में ही प्यार नहीं लिखा था। इसीलिए मैंने भी किसी से कोई उम्मीद नहीं रखी।


जब से कॉलेज जाना शुरू किया तो मैं सब चीजें भूल गई थी और मेरा मकसद सिर्फ और सिर्फ अच्छे से पढ़ाई करना था। कुछ ही दिनों में वहां मेरे दोस्त बन गए। उन्होंने मुझे जिंदगी को एंजॉय कैसे किया जाता है ये सिखाया। उनके साथ मुझे बहुत अच्छा लगता था। अपने सार गम भूल सी गई थी। तभी अचानक कॉलेज में पैरेंट्स टीचर मीटिंग होने वाली है इसकी खबर मुझे मिली। मैं नहीं चाहती थी कि मम्मी- पापा में से किसी को बुलाओ और मेरे बारे में सबको सबकुछ पता चल जाये। इसीलिए मैंने अपनी दोस्त सना से कहा कि तुम्हारे घर से कौन आ रहा मीटिंग के लिए तो उसने बताया कि उसका भाई आ रहा है। तो ठीक है अपने भाई से कह दो मेरा चचेरा भाई बन कर मीटिंग में आ जाए। किसी को भी मुझपर शक नहीं होगा क्योंकि मैं टॉपर स्टूडेंट हूं।


जिस दिन पैरेंट्स टीचर मीटिंग थी उस दिन मैं सना के भाई का इंतजार कर रही थी। सना ने उनका मोबाइल नंबर मुझे दे दिया और बता दिया था कि वो 10 बजे मुझे कॉलेज के गेट पर मिलेंगे। लेकिन वो कैसे दिखते हैं मुझे इस बारे में कोई आईडिया नहीं था। तभी अचानक एक सफेद कार आकर मेरे सामने रूकी और उसमें से एक लड़का बाहर निकला और किसी से फोन पर बात करने लगा। देखने में एकदम सैफ अली खान जैसा लग रहा था शायद उससे भी अच्छा। यूं तो मुझे लड़कों में कोई दिलचस्पी नहीं थी लेकिन पहली बार कोई दिल और दिमाग दोनों को ही पसंद आया था। अभी 9.30 ही बजे थे और मैं सना के भाई का इंतजार 1 घंटे पहले से ही करनी लगी। तभी अचानक मेरे कानों के पास एक आवाज सुनाई दी ... और किसी ने कहा - जरा सुनिए। मैंने पलटकर देखा तो वहीं सैफ अली खान वाला लड़का मेरे पास खड़ा था और मुझसे पूछ रहा था कि आर्ट डिपार्टमेंट कहां है? मैंने उसे बताया कि यहां से सीधे जाकर बाएं और वहां से सीधे जाकर दाएं फिर बाएं और फिर दाएं .... ये सुनकर वो हंसने लगा और कहने लगा ऐसे तो मैं पहुंच चुका। क्या आप वहां तक चल सकती है मेरे साथ प्लीज.... मैंने भी सोचा कि अभी सना के भाई को आने में आधे घंटे हैं तो क्यूं न इन्हें रास्ता दिखा दूं.... और मैंने साथ चलने के लिए हां कह दिया।


ये शायद पहली बार था जब मैं किसी अंजान शख्स के साथ इस तरह अकेले चल रही थी। लेकिन वो अंजान इतनी जल्दी अपना सा बन जाएगा यकीन नहीं हो रहा था। उन्होंने अपना नाम कबीर बताया और हम दोनों इधर- उधर की बातें करने लगे। जैसे ही हम आर्ट डिपार्टमेंट पहुंचे वहां सना पहले से ही खड़ी हुई थी और वो भाईजान कहकर उस लड़के को बुलाने लगी। मुझे यकीन ही नहीं हो रहा था कि वो ही लड़का है जिसका इंतजार मैं बाहर कर रही थी। खैर हमने एक- दूसरे को देखा और मुस्कुराने लगे। मीटिंग खत्म होने के बाद मैंने उन्हें थैक्यू कहा और उन्होंने फिर एक बार इसका जवाब मुस्कुरा कर दिया। उसके बाद से हमारी अकसर फोन पर बातें होने लगी और चैटिंग भी।


अब मेरे दिलो दिमाग पर सिर्फ और सिर्फ कबीर ही छाया हुआ था। अजीब सा जादू कर दिया था उसने मुझपर। कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या करूं। सोचा उसे अपने दिल की बात कह दूं लेकिन फोन करने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। तभी कुछ दिनों बाद पता चला कि कबीर की इसी कॉलेज में प्रोफेसर के पद पर नौकरी लग गई है और वो भी मेरे ही सब्जेक्ट के प्रोफेसर। डर भी लग रहा था कि अब तो पढ़ाई चौपट और खुशी भी हो रही थी कि कबीर आ रहा है। अगले दिन कबीर ने क्लासरूम में एंट्री ली और अपना परिचय दिया। मैं तो कबीर को देखे जा रही थी तो पढ़ाई में क्या मन लगाती। सना के जरिए मुझे कबीर से मिलने और बात करने का मौका मिल जाया करता था लेकिन क्लास में कबीर प्रोफेसर की तरह ही बर्ताव करता था। एक दिन कॉलेज कैंटीन में कबीर चाय पी रहा था और इत्तेफाक से मैं भी वहां पहुंच गई। उसने मुझे चाय ऑफर की और मैंने भी मना नहीं किया। हमारी काफी देर तक बात होती रही लेकिन इस दौरान कबीर ने एक लफ्ज भी ऐसा नहीं बोला था जिससे मुझे यकीन होता कि वो भी मुझे पसंद करता है। मैं भी उस दिन के बाद से कबीर से दूर- दूर सी रहने लगी और अपनी एग्जाम की तैयारी करने लगी।


एग्जाम खत्म हुए और कुछ ही महीनों में रिजल्ट भी आ गया। मैंने इस बार भी कॉलेज में टॉप किया था। सभी लोग बधाई दे रहे थे लेकिन कबीर ने कुछ भी नहीं कहा। हां उस दिन मुझे बहुत दुख हुआ था। तभी सना ने मुझसे कहा कि आज शाम को उसने एक पार्टी रखी है जिसमें सभी को बुलाया है और मुझे भी आना होगा। मैंने आने के लिए हामी भर दी लेकिन मेरा गुस्सा अभी तक शांत नहीं हुआ था और मैंने सोच रखा था कि आज शाम को पार्टी में कबीर से बोल दूंगी कि मुझे भी उसमें कोई दिलचस्पी नहीं है। वो बातें और चैटिंग एक बचकानी हरकत थी। खैर किसी तरह अपने आप को दिलासा दिया और पार्टी में पहुंच गई। वहां पहुंच कर मैंने देखा कि सब लोग आये हुए हैं लेकिन कबीर नहीं दिखा। मैंने भी फैसला कर लिया कि मैं किसी से उसके बारे में नहीं पुछूंगी। तभी केक आता है और मैं देखती हूं कि उसमें मेरा नाम लिखा है, नाजिया ..... मेरे लिए इतना बड़ा सरप्राइज रखा था सबने मिलकर मुझे यकीन ही नहीं हो रहा था। मैं भागकर अपने दोस्तों के पास गई और उन्हें गले लगाया और थैंक्स कहा। लेकिन अगला सरप्राइज मेरे जिंदगी बदलने वाला था। हां वो अगला तोहफा कबीर था। अचानक गिटार लिए एक बंदा मेरे सामने आया और गुनगुनाने लगा, '' एक अजनबी हसीना से... मुलाकात हो गई।'' वो कोई और नहीं बल्कि कबीर था। उसने सबके सामने मुझे प्रपोज किया और माफी भी मांगी मुझे इग्नोर करने के लिए। उस दिन मुझे यकीन हुआ कि ऊपरवाले ने देर से ही सही लेकिन मेरी जिंदगी में किसी फरिश्ते को भेजा तो सही।


अब जब भी मैं अपने पहले प्यार के बारे में सोचती हूं तो ये हसीन यादें एक बार फिर पुराने लम्हें ताजा कर देती हैं। अगर कॉलेज के दिनों में कबीर मुझे इस तरह इग्नोर न करते तो आज मैं अपना करियर नहीं बना पाती। शायद प्यार इसी को कहते हैं।


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प्रकाशित - अगस्त 5, 2018
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