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#मेरा पहला प्यार: कैसे कोई इस हद तक किसी को चाह सकता है

#मेरा पहला प्यार: कैसे कोई इस हद तक किसी को चाह सकता है

जब प्यार दस्तक देता है तो मायूसी के बादल कब छट जाते हैं पता ही नहीं लगता। इस बार ‘मेरा पहला प्यार’ सीरीज में हम आपको बता रहे हैं एक ऐसी ही लव स्टोरी के बारे में, जिसने हिम्मत दी एक लड़की को उसके सपने पूरे करने में। पढ़िए रूबी के पहले प्यार की कहानी, उसी की जुबानी..


मैं रहने वाली तो बिहार के छोटे से गांव की हूं, लेकिन मेरी पढ़ाई- लिखाई सब दिल्ली में पूरी हुई। मेरे पापा दिल्ली में एक कॉलोनी में कपड़े प्रेस करने का काम करते हैं। और वो चाहते थे कि उनके बच्चे पढ़े- लिखे और अच्छा पैसा कमाएं। इसी वजह से वो मुझे और मेरे बड़े भाई को अपने साथ दिल्ली ले आए। हमे कॉलोनी के पार्क में ही एक छोटा सा कमरा रहने के लिए मिल गया और हम वहां रहकर ही पढ़ाई करते और पापा के काम में हाथ भी बंटाते। मेरी उम्र उस समय 22 साल थी। देर से पढ़ाई शुरू करने की वजह से कॉलेज भी देर से जाना शुरू किया।


कॉलेज का पहला दिन था और मैं समय से पहले ही वहां पहुंच गई। कॉलेज की चकाचौंध के सामने मेरे अरमान फीके पड़ गए थे। पहले दिन सबके दोस्त बन गए लेकिन मेरे से किसी ने बात तक नहीं की। शायद मेरे कपड़ों उनके कपड़ों की तरह चमकदार नहीं थे। बुरा जरूर लगा लेकिन मुझे मेरी मंजिल तक पहुंचना था। ये सब चीजें मेरे इरादों को कमजोर नहीं कर सकती थी।


एक दिन मैं क्लास खत्म होने के बाद जैसे ही डिपार्टमेंट से बाहर निकली तभी पीछे से किसी ने आवाज दी और बताया कि मेरे बैग फटा हुआ है और उससे सामान नीचे गिर रहा है। मैं हड़बड़ा गई और तुरंत अपने बैग संभाला। ये नजारा देखकर वहां कुछ लोग हंसने लगे। लेकिन मैंने जवाब देने से की जगह नजरअंदाज करना बेहतर समझा। लेकिन इस दौरान कोई शख्स ऐसा वहां मौजूद था जो ये सबकुछ नोटिस कर रहा था। अगले दिन जब क्लास में पहुंची तो वहां लोगों का बर्ताव मेरे साथ एकदम बदल गया। सब मुझसे बात कर रहे थे। मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि ऐसा क्या हुआ जो सब लोगों का नजरिया मेरे लिए एकदम बदल गया। खैर जो भी हो रहा था मैं इससे खुश थी। इसी तरह कब दो साल बीत गये पता ही नहीं चला।


लेकिन पता नहीं मुझे ऐसा क्यों लग रहा था कि कोई तो है जो मेरे घर से लेकर कॉलेज आने तक पीछा करता है। कई दिनों से मुझे ये बात परेशान कर रही थी। और एक दिन ऐसा आया जब इस राज से पर्दा भी हट गया। उसका नाम रोहन था। वो मेरी ही कॉलोनी में रहता था और कॉलेज में भी साथ पढ़ता था। कई दिनों से वो मुझसे बात करना चाह रहा था। उसने मुझे अपने जन्मदिन पर घर में पार्टी पर बुलाया और सबसे मेरा परिचय कराया। लेकिन उसकी मां को मेरा आना अच्छा नहीं लगा। इसीलिए उन्होंने पार्टी में सबके सामने ही मुझे कपड़े की गठरी प्रेस कराने के लिए थामा दी। रोहन को ये बात बुरी लगी और वो अपनी मां पर चिल्ला बैठा। मैं भी घर वापस आ गई।


अगले दिन जब हम कॉलेज में मिले तो मैंने उसे बहुत समझाया कि वो मुझसे बात न करें। मैंने उसे बताया कि तुम्हारी मम्मी गलत नहीं है क्योंकि समाज में दोस्ती भी हैसियत देख के की जाती है और मैं तुम्हारें दोस्ती के लायक भी नहीं हूं। रोहन की आंखों में आंसू थे। वो कुछ भी न कह पाया और मुझे जाते हुए एक खत दे गया। खत में लिखा था ---


'' तुम कौन हो कहां से आई हो मुझे नहीं पता है। लेकिन तुम्हारी हिम्मत देखकर मुझमे हिम्मत आई है। तुम दूसरों के घरों में जाकर खाना बनाती हो, अपने पापा के काम में हाथ बंटाती हो और साथ ही पढ़ाई भी करती हो। जब मैंने तुम्हें पहली बार देखा तो मुझे अंदाजा भी नहीं था कि चेहरे पर हमेशा मुस्कुराहट रखने वाली लड़की कितना कुछ सहन करती है लेकिन अपने चेहरे पर शिकन तक नहीं आने देती। एक फटे बैग को भी साल भर कैसे चलाया जा सकता है मैंने तुमसे सीखा है। तुम मेरी प्रेरणा हो। मैं तुमसे दोस्ती नहीं करना चाहता था क्योंकि मैं तुमसे प्यार करता हूं। तुम्हारी इज्जत करता हूं। लेकिन डरता था कि कहीं तुम इस रिश्ते में बंधकर अपनी ख्वाहिशों को विराम न दे दो। इसीलिए बस तुम्हें दूर से ही देखता रहता था। मैं मुंबई जा रहा हूं आगे कि पढ़ाई करने,  उम्मीद है कि तुम भी अपने पापा के सपनों को हकीकत कर दिखाओगी। जरूरी नहीं है कि हर प्यार की मंजिल हो। मैं तुम्हारा इंतजार करूंगा... जब तक तुम चाहो। लेकिन मेरी एक शर्त है कि तुम जो सपने लेकर दिल्ली में आई थी उन्हें किसी भी हालत में पूरा करोगी।


लव यू ....


तुम्हारा हो चुका रोहन''


मैंने कभी नहीं सोचा था कि कोई मुझे प्यार करेगा। वो भी इस तरह.. मैं भी रोहन को पसंद करती थी। लेकिन मुझे अपनी हैसियत पता थी। लेकिन इस खत को पढ़ने के बाद अब मुझे सिर्फ और सिर्फ अपने पापा और रोहन का सपना पूरा करना था और मैं अगले ही पल से सिविल एग्जाम की तैयारियों में जुट गई। उधर मेरे कॉलेज के भी नतीजे आ गये। मैंने पूरे कॉलेज में तीसरे स्थान पर टॉप किया था। और ये बात मुझे रोहन को भी बतानी थी लेकिन मेरे पास उसका नंबर नहीं था। रात में मेरे फोन पर एक अंजान नंबर से कॉल आया। वो फोन रोहन का था। उसने मुझे बधाई दी और अपनी शर्त फिर से याद दिलाई। उस दिन हमने ढेर सारी बातें कि लेकिन सिर्फ उस दिन उसके अगले ही दिन वो नंबर बंद हो गया। मैं समझ गई थी कि ऐसा रोहन ने क्यों किया था। कुछ ही दिनों में मेरे सिविल एग्जाम के भी नतीजे आ गये और मैं सेलेक्ट हो गई थी। मुझे कलेक्टर की ट्रेनिंग के लिए रायपुर भेजा गया। जहां मैंने अपनी ट्रेनिंग पूरी की और कलेक्टर बन गई। मुझे यकीन ही नहीं हो रहा था कि मेरे सपनों को इतनी जल्दी पंख लग गये। पापा बहुत खुश थे। हमें सरकारी बंगला भी मिला था रहने के लिए। लेकिन रोहन की कोई खबर नहीं थी। एकतरफ तो खुशी थी लेकिन दूसरी तरफ मन उदास था।


कुछ ही दिनों में मुझे पापा ने बताया कि तेरे लिए एक बहुत अच्छे लड़के का रिश्ता आया है। मैंने मना कर दिया कि मुझे शादी नहीं करनी। लेकिन पापा जिद्द करने लगे तो मैंने उनसे लड़के को बुलाने के लिए कहा। मैंने सोचा कि मैं लड़के को साफ- साफ न कह दूंगी कि मैं किसी और का इंतजार कर रही हूं। अगले दिन जब मैं दफ्तर से घर पहुंची तो मैंने रोहन की मम्मी को सामने खड़ा देखा। उन्होंने मुझे गले लगाया और माफी मांगी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि ये सब क्या हो रहा है। फिर मुझे कॉलेज के दिनों की याद आ गई। वो बैग वाली बात.... उस समय भी रोहन ही था। मैं खुशी के मारे पागल हो उठी और पूरे घर में रोहन को ढूंढने लगी। तभी मैंने देखा कि बगीचे में एक लड़का हाथ में फूलों का गुलदस्ता लिए हुए खड़ा है... हां वो रोहन ही था। उस दिन मुझे एहसास हुआ कि हर प्यार की मंजिल भले न हो लेकिन एक कहानी जरूरी होती है।


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प्रकाशित - अगस्त 19, 2018
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