#मेरा पहला प्यार : प्रेरणास्रोत बना कभी हार न मानने वाला बचपन का प्यार

#मेरा पहला प्यार : प्रेरणास्रोत बना कभी हार न मानने वाला बचपन का प्यार

प्यार दो धड़कते दिलों की कहानी होती है, यह तो मैं जानती थी, लेकिन यह प्यार बहुत पक्का था, इतना पक्का कि जिसे न राज्यों की दीवार और न ही कोई रिश्ता तोड़ सका। इस बार मेरा पहला प्यार कहानी सीरीज में मेरी कजिन शिल्पी के पहले और आखिरी प्यार की दास्तान पेश है, जो मेरी बहन होने के साथ एक प्यारी सी सहेली भी है। शिल्पी को उसके बचपन, यानि सिर्फ 16 साल की कच्ची उम्र में ही हो गया था पहला प्यार, लेकिन यहा ऐसा प्यार था जो उम्र भर साथ निभाए। अब शिल्पी एक बेटी की मां है और वह मराठी लड़का मेरा बहनोई, लेकिन इनकी लव स्टोरी है बेमिसाल, जो ऐसे अनेक लोगों के लिए प्रेरणास्त्रोत बन चुकी है जो प्यार तो करते हैं, लेकिन मजहब, धर्म या राज्यों की दीवार के चलते इनका प्यार हल्का पड़ जाता है। 


मेरे सामने वाली खिड़की में...


वह शिल्पी के सामने वाली कोठी में ही रहता था। रश्मि जहां नॉर्थ इंडियन थी, वहां वह मराठी परिवार से था। जब शिल्पी छत पर कपड़े सुखाने जाती तो उसे देखता, जब शिल्पी स्कूल जाती, तो उसे निहारा करता। शिल्पी जब भी जहां कहीं भी जाती, उसकी नजरें उसी पर टिकी होतीं। कुछ ही दिनों में शिल्पी को समझ आ गया था कि उसकी नजरें उससे क्या कहना चाहती हैं। इधर शिल्पी की मां बहुत सख्त थीं, कुछ ही दिनों में उनकी नजरों को भी समझ आ गया था कि आखिर यह चल क्या रहा है। इस पर शिल्पी को मिली सख्त हिदायतों के साथ सख्ती और भी बढ़ गई। फिर भी दिलों में प्यार धीरे- धीरे बढ़ता ही गया। आपस में स्कूल और फिर कॉलेज के बहाने मिलना भी होने लगा। इसी बीच मैं गर्मी की छुट्टियों में अपनी मौसी के घर अहमदाबाद गई। कुछ ही दिनों में शिल्पी ने मुझे अपने चल रहे प्यार और उसके बारे में सबकुछ बता दिया। हम दोनों शाम के वक्त टहलने निकले और वो हमें कॉलोनी से कुछ बाहर निकलते ही मिल गया। मैं हालांकि शिल्पी से एक साल छोटी थी, फिर भी खुद को उसकी सहेली के रूप में जिम्मेदार समझते हुए मैंने उसे एप्रूव कर दिया। अब हम रोज शाम को टहलते वक्त मिलने लगे। कभी- कभी कहीं बाहर घूमने जाने के बहाने भी मिलना हो जाता।


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मस्ती का वो दौर...


इस बीच मेरा और शिल्पी का इंदौर जाने का प्रोग्राम भी बना। इंदौर जाने के लिए भी वह तैयार हो गया। हमें बस में बैठाने मौसाजी बस अड्डे पर आए। जैसे ही बस चलने लगी, मौसाजी से नजर बचाकर वह पीछे के दरवाजे से बस में चढ़ गया और फिर हम तीनों साथ- साथ मुंबई गए। वहां भी हमारे रिश्तेदार थे, जिनकी लड़की भी हम दोनों के बराबर थी। हमने उसे भी आपस में मिला लिया। अब हम मुंबई में भी खूब मिलने जुलने लगे। मुंबई का ट्रिप काफी मजेदार रहा। हम वापस भोपाल लौटे, लेकिन इसके बाद मुझे तो वापस आना था। कुछ दिनों की मौज- मस्ती और इस प्यार की यादों के साथ मैं अपने घर वापस लौट आई। मुझे शिल्पी के प्यार के बारे में सब मालूम था, लेकिन मैं फिर भी उससे अलग से बात नहीं कर पाती थी, क्योंकि उस जमाने में मोबाइल फोन तो होते नहीं थे। बिना मोबाइल फोन वाले जमाने में भी कैसे यह प्यार इतना परवान चढ़ गया, यह मुझे काफी समय बाद पता लगा।


इतनी खराब चिट्ठी...


इस बीच मुझे पता लगता रहता था कि शिल्पी की शादी के बारे में रिश्ते देखे जा रहे हैं। ये लड़का देखा, वो लड़का देखा आदि- आदि। मुझे तब तक भी इतना भरोसा नहीं था कि शिल्पी जैसे सीधी- सादी दिखने वाली लड़की इतनी स्ट्रॉन्ग हो सकती है। एक दिन मुझे पता लगा कि शिल्पी की शादी हमारी ही कम्युनिटी में तय होना जा रही है। मुझे काफी चिंता हो गई थी, लेकिन कुछ कर नहीं सकती थी। इसके कुछ ही दिन के बाद मेरे मौसाजी की एक चिट्ठी या इसे शादी का न्यौता भी कह सकते हैं, हमारे घर पहुंच गई। इसमें लिखा था कि हमारे घर पर एक लाश (शिल्पी नाम की) रखी है, उसे डिस्पोज़ करना है। इसके लिए एक साधारण आयोजन किया जाएगा, अगर आपके पास समय हो तो आकर हमारा हाथ बंटाएं। यह चिट्ठी देखकर हमें समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। वहां से परिवार के लिए बुलावा आया नहीं था, तो मेरे मम्मी- पापा अकेले ही अहमदाबाद चले गए। पता लग गया था कि शिल्पी की शादी मजबूरन उन्हें उस मराठी से ही करनी पड़ रही है। लेकिन क्यों… यह पता नहीं था।


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गुपचुप हो चुकी थी शादी


दो- चार दिन के बाद जब मम्मी- पापा लौटे तो पता लगा कि जब शिल्पी को देखने- दिखाने का दौर चल रहा था, उसी बीच इन दोनों ने कोर्ट मैरिज कर ली थी। मजेदार बात यह कि शादी करने के बावजूद शिल्पी की हिम्मत नहीं हुई थी घर में बताने की तो वह पहले की ही तरह से घर में रह रही थी। जब शिल्पी की शादी बिलकुल तय होने लगी, तब उसे यह बात घर में बतानी पड़ी और इस तरह से मेरी मौसी- मौसाजी को मजबूरत अपने जान-पहचान वाले लोगों के बीच उसकी दिखावे वाली शादी करनी पड़ी। शिल्पी के मम्मी- पापा और भाई ने उससे बात करना तक बंद कर दिया था। लेकिन सामने वाले घर में उसके ससुराल वाले उसे बहुत ही अच्छे मिले, जिन्होंने उसे पूरे मन से अपनी बड़ी बहू स्वीकार किया। इसके बाद हालांकि धीरे- धीरे शिल्पी के पूरे परिवार वाले उसके साथ ठीक हो गए और उनके घर में दामाद को पूरा मान- सम्मान भी दिया जाने लगा। आज शिल्पी अपने भरे- पूरे परिवार में अपनी कॉलेज गोइंग बेटी के साथ बहुत खुशनुमा जिंदगी गुजार रही है और वह मराठी लड़का आज भी उसे उससे भी ज्यादा प्यार करता है, जितना तब करता था।


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