#मेरा पहला प्यार : बहन की शादी में हुआ मेरा गठबंधन

#मेरा पहला प्यार : बहन की शादी में हुआ मेरा गठबंधन

प्यार एक ऐसा एहसास है, जिसे सिर्फ वही जी सकता है, जो उससे गुज़र रहा हो। प्यार में डूबा इंसान किताबी और फिल्मी दुनिया से अलग अपने रूमानी एहसासों को शायराना अंदाज़ में जीता है। प्यार में खोए जोड़े के लिए जाति, उम्र, रिश्ता, मजहब, समय… कुछ भी मायने नहीं रखता है। इस बार ‘मेरा पहला प्यार’ सीरीज में हमें पूर्णिमा ने अपनी कहानी भेजी है, जिसे पढ़कर आपको लगेगा कि कभी न कभी आप भी उस पल को जी चुके हैं। उनकी ज़िंदगी के इस पन्ने को पढ़कर आप सोचेंगे कि अगर थोड़ी स्याही आपके पास भी रही होती तो यह पन्ना शायद आपकी ज़िंदगी की किताब में भी हो सकता था।


‘मैं बी.कॉम. सेकंड ईयर की स्टूडेंट और कॉलेज की टॉपर थी। मैं जॉइंट फैमिली में रहती थी और दोस्ती, प्यार-मोहब्बत जैसे अल्फाज़ मेरे लिए कोई मायने नहीं रखते थे। उसी बीच मेरी बहन को अपनी सीनियर के भाई से प्यार हो गया। काफी मान-मनौव्वल के बाद घरवालों ने इस रिश्ते के लिए हामी भर दी थी। चाचा की शादी के 22 साल बाद बहन की शादी के बहाने घर में अब जश्न का मौका आया था, कहीं से भी कोई कमी नहीं रखी जा रही थी। जीजाजी की फैमिली भी बहुत अच्छी थी, मम्मी-पापा, दो बड़ी बहनें और एक छोटा भाई। अगर सिर्फ बच्चों की गिनती की जाए तो हमारे घर में लगभग 8 बच्चे थे, जिनमें से 6 बहनें थीं। ऐसे में जब तिलक का दिन आया तो घर के बड़ों के साथ हम बहनों ने भी साथ चलने की ज़िद ठान ली। हम लोग उस बहाने से दीदी की ससुराल का माहौल देखना चाहते थे।


… वह हमारी पहली मुलाकात थी। दीदी का देवर दिल्ली में जॉब करता था और इससे पहले हम कभी मिले नहीं थे। जैसा कि हर आम भारतीय घर में होता है, हम सब सालियां दीदी के देवरों को देख रही थीं। मगर उस समय हम लोगों ने यह ध्यान नहीं दिया कि सामने वाली पार्टी भी बराबर से हमारी ओर नज़र रखे हुए थी। खैर, उस दिन नॉर्मल इंट्रोडक्शन हुआ और हम लोग घर लौट आए। हमें यह नहीं पता था कि उस एक मुलाकात में सामने वाले के दिल में प्यार की लौ जल उठी थी। घर आए तो फिर शादी की शॉपिंग और बाकी तैयारियों में व्यस्त हो गए। फरवरी के महीने में आमतौर पर बारिश नहीं होती थी मगर उस साल दीदी की शादी के 2 दिन पहले से ही मौसम कुछ बदला हुआ सा लगने लगा था। बादलों की गर्जन के साथ ही बिजली ने भी अपना खेल दिखाना शुरू कर दिया था।


… शादी का दिन आया और हम सबका उत्साह दोगुना हो गया। फेरों के समय जब मैं दीदी को लेकर मंडप तक आई तो जीजाजी के पापा और बहनों ने यूं ही मज़ाक में कह दिया कि बड़ी बेटी के साथ छोटी को भी विदा कर दीजिए। वह बात तो मज़ाक में की गई थी पर उसका कुछ असर दीदी के देवर और मुझ पर हो गया था। सभी रस्मों के पूरा होने के बाद अंताक्षरी और हंसी-ठिठोली का कार्यक्रम चल रहा था। तब अचानक मुझे एहसास हुआ कि दीदी-जीजाजी के गठबंधन के साथ ही वहां एक और रिश्ता भी जुड़ गया था। खैर, दीदी तो विदा हो गई पर उसके साथ ही मेरे दिल का कुछ हिस्सा भी उसी घर में चला गया था। तब मेरे पास मोबाइल नहीं था, दीदी के देवर आकाश ने हमारे घर का लैंडलाइन नंबर लिया और उस पर अक्सर कॉल करने लगा।


फिर हमारी मुलाकातों का सिलसिला भी बढ़ने लगा। हम कभी कॉलेज के बाहर मिलते तो कभी घर में ही… और फिर 15-20 दिनों बाद वह वापस दिल्ली चला गया। हम दोनों ही शादी की रात हुए उस मज़ाक को लेकर बहुत गंभीर हो चुके थे और इसीलिए हमने निर्णय लिया कि जल्द ही घरवालों को अपने रिश्ते के बारे में बता देंगे। लगभग तीन-चार महीने बाद वह दिन भी आया... स्वभाव से हमेशा कूल रहने वाले मेरे जीजाजी का पारा उस दिन हाई हो गया। जब वे ही तैयार नहीं थे तो घर के बड़ों से कैसे उम्मीद की जा सकती थी। हिम्मत करके बाकी सबसे बात की गई और सबने एक सिरे से इस रिश्ते के लिए इनकार कर दिया। सबकी एक ही राय थी कि एक ही घर में दो सगी बहनों की शादी नहीं की जा सकती है। हमारा रोना-चिल्लाना, मान-मनौव्वल… कुछ भी काम नहीं आ रहा था।


हम दोनों घरवालों के गुस्से के शांत होने का इंतज़ार करने लगे। इसी बीच मेरे लिए लड़का देखा जाने लगा, यह बात जब आकाश को पता चली तो वह ट्रांसफर लेकर लखनऊ आ गया। हम दोनों ने एक बार फिर घरवालों को मनाने की कोशिश शुरू की पर कोई भी टस से मस नहीं हो रहा था। आखिरकार, दीदी के सास-ससुर आकाश के लिए भी लड़की देखने लगे। यह हमारे प्यार की गहराई ही थी कि कुछ भी हम दोनों को अलग नहीं कर पाया। इस बीच मेरी छोटी बहनों की भी शादी हो गई और बाहरी लोग मुझ पर उंगली उठाने लगे। हम दोनों अपने फैसले पर अडिग थे, कई बार मन में आया कि भागकर शादी कर लें पर फिर घर की गरिमा का ख्याल कर इस बात को दिमाग से निकाल दिया। दीदी की शादी के लगभग 8 साल बाद आखिरकार हम दोनों के घरवाले इस रिश्ते के लिए मान गए। मगर हमारी शादी में आकाश की दीदी ने आने से मना कर दिया। उन्हें लगा था कि शायद उनके इस कदम से हम दोनों पीछे हट जाएंगे पर इन 8 सालों में हमारा प्यार बहुत परिपक्व हो गया था और अब उसकी मंजिल शादी ही थी।


हमारी शादी को 5 साल हो गए हैं और एक नटखट बेटा भी है। हमारा प्यार आज भी बिल्कुल वैसा ही है, जैसा 13 साल पहले था, बल्कि साथ रहने से अधिक गहरा होता जा रहा है। तो ऐसा था मेरा पहला प्यार, जो कि मेरी ज़िंदगी बन गया। कह सकते हैं कि बहन की शादी में मेरा भी गठबंधन हो गया था। अब हम दोनों बहुत खुश हैं और हमारे परिवार भी।’


आज का युवा ज़रा-ज़रा सी बात पर हिम्मत हार जाता है, जो कि बहुत गलत है। पूर्णिमा और आकाश की इस लव स्टोरी से हम सबको कुछ सीखना चाहिए। प्रेम के साथ ही अगर जीवन में धैर्य भी हो तो हर मुश्किल आसान हो जाती है। ज़िंदगी कोई परिकथा नहीं होती है, हमें उसे आसान और सहज बनाना पड़ता है। 


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