कहानी ...वह "स्वयंसिद्धा" जो थी

कहानी ...वह "स्वयंसिद्धा" जो थी

ये कहानी है एक स्वयंसिद्धा की, जिसने अपने कुटुंब द्वारा जबरन किये जा रहे विवाह का विरोध कर अपने लिए सही जीवनसाथी चुना और पूरे देश की मेरिट में अपना नाम लाकर अपनी मां के संस्कारों और अपनी योग्यता का परिचय दिया।


अंजना का फोन सुबह से लगातार बज रहा था, बधाइयों और शुभकामनाओं का जैसे तांता लगा हुआ था। उसने 'पीसीएस' परीक्षा में एक सौ इक्यासी नम्बर पर कब्जा किया था।


काफी लोग घर पर भी फूल और मिठाई लेकर आ रहे थे और तारीफों के पुल बांध कर खुद को ज्यादा 'सगा' घोषित करने की कोशिश कर रहे थे। उनमें से अधिकांश लोग वो रिश्तेदार थे जो पूर्व में उससे सम्बन्ध तोड़ चुके थे।


आज सूखी हुई जड़ों को गंगाजल से सींच कर फिर संबंधों के वृक्ष को पूर्ववत कर पिछले छह साल के अपमान और कटु उक्तियों की खाई को उपहारों और प्रेमपूर्ण व्यवहार से पाटना चाह रहे थे।


अंजना अपने साथ हुए उस व्यवहार का बदला लेना चाहती थी। अतीत के बारे में सोचती हुई बिस्तर पर अधलेटी सब कुछ याद करने लगी, जो उसने अब तक के अपने जीवन में देखा, सुना और सहा था।


"अंजना की मां का विवाह 38- 39 की वय में हुआ। अस्सी के दशक में, शायद ही कोई पारिवारिक परेशानी ही रही होगी, अन्यथा उस दौर में तेरह- चौदह वर्ष की आयु पर्याप्त मानी जाती थी विवाह के लिए। फिर सन् 83 में अंजना का जन्म हुआ और डेढ़ साल बाद एक और बहन संजना का। उसके जन्म पर तो तसल्ली थी पर संजू के जन्म पर बहुत मातम मनाया गया।


दादी, परदादी, चाची, बड़ी मां सबके पुत्रवती होने के गर्व प्रदर्शन और तानों के बीच अंजना भी बड़ी होने लगी। पहले अंजना का बेटी होना हेय नजरों से देखा गया पर अब उसका प्रतिभा सम्पन्न होना ईर्ष्या का विषय हो गया था।


प्रतिवर्ष स्वयं भी अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होती और बहन को भी पढ़ाती। बारहवीं में रिकार्ड बनाया था। परिवार में अभी तक किसी के भी इतने नम्बर न आये थे, पर इसका श्रेय उसे न मिलकर उन ट्यूशन पढ़ाने वाले मास्टरों को मिला जिनके पास जाने के लिये वो सुबह छह बजे घर से निकलती थी। कहा गया उन्होंने ही कॉपी बनवाईं, नही तो बेटे ही ज्यादा काबिल हैं।


पर सबको अनसुना करके उसने पढ़ाई जारी रखी। भगवान भी कभी- कभी बहुत निर्दयी हो जाता है। अब तक जिन मां- बाप के सहारे पूरी दुनिया से टक्कर लिए हुई थी, एक महीने के बाद वो दोनों भी किसी बीमारी से चल बसे।


रिश्तेदारों ने तेरहवीं तक तो बहुत ढांढस दिया, पर मौका आने पर कन्नी काटने लगे। मामा, चाचा, फूफा, सब गायब हो गये। अब दोनों बहनें ही एक- दूसरे का संबल थीं।


संजना की बारहवीं बोर्ड परीक्षा थी, अतः दोनों की सहमति से अंजना एक कम्प्यूटर केंद्र में अंशकालिक शिक्षक की नौकरी करने लगी, जिससे खाने का प्रबंध होने लगा। वह अन्य शिक्षकों के मुकाबले वो कम समय दे पाती, तब भी उसे पेमेंट पूरी मिलती और आवश्यकता पड़ने पर अवकाश भी।


कम्प्यूटर केंद्र का प्रधान 'धीरज', अंजना को मन ही मन पसन्द करता था। वह कायस्थ था इसलिए कभी प्रेम - प्रस्ताव नही दिया। घर से काफी सम्पन्न था और व्यवहार कुशल भी। कई बार अंजू को कुछ समय धीरज के साथ बिताना पड़ा, पर वो बंदा कभी नजर उठाकर भी न देखता।


एक दिन एक ऐसी तूफानी रात आई, जब किसी जरूरी काम के लिए धीरज को अंजू के घर आना पड़ा, और भारी बारिश के कारण रुकना भी पड़ा। अंजना अकेली न थी, बहन संजना थी साथ में, पर दुनिया को कौन समझाये। दूसरे दिन अंजना के घर में पंचायत लगी।


"कौन था वो?"ताऊजी ने कड़ककर पूछा।


"कम्प्यूटर सेंटर का प्रिंसिपल है, जहां मैं पढ़ाती हूं।"


"आया क्यों था?"


"नंबर देने बच्चों के, मुझे सोमवार तक रिजल्ट तैयार करके देना है।"


"हूं..... सुबह पांच बजे रामवतार ने घर से निकलते देखा है, ये सच है?"


"हां ताऊजी, अचानक पानी आ गया था, कैसे जाता सो रुक गया था।"


"मतलब जानती हो इसका?"


"मतलब? मैं अकेली थोड़े ही थी, संजू थी न साथ में।"


"चुप कर पतुरिया कहीं की, नाक कटवा के रख दी है और ऊपर से बहस भी कर रही है।" दादी ने बचे खुचे दांत पीसते हुए कहा।


"दादी, आप तो ऐसा न कहिये।"


"क्यों न कहें, काम जो ऐसा की हो, मां बाप की आत्मा कुढ़ रही होगी सो अलग"


"आप ही बताओ, अब क्या करूं मैं?"


"करना क्या है, अबसे स्कूल- कॉलेज सब बंद,और निर्मला के बेटे से बात चलाते हैं शादी की।"


"पर वो तो पूरे दिन गांजे में डूबा रहता है, और बात करने की तक की तमीज नहीं है। घर तक नहीं ढंग का रहने के लिए।" संजना ने कहा।


"तुम चुप रहो, छोटी हो छोटी जैसी रहो, किसी ने राय नही मांगी तुम्हारी।"


 


अगले दिन सोमवार को धीरज को रिजल्ट सौंपते हुये अंजना ने कहा, "कुछ पूछना था आपसे।"


"जी, कहिये।"


"उस दिन रात में आप मेरे घर रुके थे, और सुबह आपको घर से निकलते हुये हमारे पड़ोसी ने देख लिया था, बहुत नाराज हैं सब।"


"सॉरी, बताइये कैसे समझाया जा सकता है, जो आप कहें, मैं करने को तैयार हूं।"


"शादी"


"जी ?"


"अंधा क्या चाहे दो आंखें" वाली बात हो गयी थी धीरज के लिए।


"पर आप तो विशुद्ध ब्राम्हण परिवार से हैं।"


"हां, पर किसी और से शादी करने पर चरित्रहीन ही कहलाती रहूंगी।"


"जी, मैं तैयार हूं। जब, जहां और जैसे आप कहें।"


"ओके, कल कोर्ट में फाइल करते हैं, फिर तारीख मिलने पर उसी दिन मन्दिर में कर लेते हैं।"


"ठीक है।"


'मधुरयामिनी' में अंजना ने धीरज से कहा कि, "मेरा तोहफा"


"वो...वो...आज तो मैं कुछ नही लाया, पर बता दीजिये जो भी चाहिये हो, कल ही ला दूंगा।"


"पहले वादा करो, जो चाहूंगी वो दोगे।"


"जरूर, बस मेरी जद में हो।"


"बिल्कुल है।"


"कहिये"


"मैं पीसीएस क्लीयर करना चाहती हूं।"


"ठीक है, कल ही कोचिंग सेंटर पर बात करता हूं।"


"सच" कहते हुये धीरज के गले से लग गयी अंजना।


धीरज का परिवार भी बहुत अच्छा था, पूरी तरह सहयोग किया अंजना का। एक साल पूरा होते होते एक बेटा भी आ गया पूरे परिवार ने मिलकर सम्हाला उसे, जिस से अंजना ने फिर से पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित किया और आज पूरे परिवार की दो साल की मेहनत का नतीजा था ये रिजल्ट, जिसने सभी दूर हुए रिश्तों को फिर से करीब ला दिया।


तभी धीरज और मांजी ने कमरे में प्रवेश किया और मांजी ने कहा जाओ बाहर तुम्हारे रिश्तेदार आये हैं मिल लो।


आज तुम स्वयंसिद्धा बन कर उनके सामने खड़ी हो, और वो अपने व्यवहार पर शर्मिंदा हैं। जाओ और उन्हें एक बार फिर अपनी मां के दिये संस्कारों का मान रखते हुए माफ़ कर दो।  एक अलग आत्मविश्वास से अंजना का मुखमण्डल दीप्तिमान हो उठा। वह स्वयंसिद्धा जो थी।


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