कहानी - अपनी मरजी से खूब उड़े मेरी चिया

कहानी - अपनी मरजी से खूब उड़े मेरी चिया

ये कहानी है एक लड़की की, जो छटपटा रही है अपनी जिंदगी अपनी खुशी और अपने मन से जीने के लिए...जिसे लगता है कि लड़की की जिदगी किसी न किसी दूसरे के हाथ में क्यों रहती है...आखिरकार उसे उड़ने के लिए पंख मिल ही जाते हैं।


करीब 7 साल के बाद फिर हमारी पोस्टिंग भोपाल हो गई। यदि किसी जगह दोबारा आना होता है तो वह शहर अपना सा लगने लगता है वही जानी- पहचानी सड़कें, वही देखे भाले रास्ते और परिचित चेहरे. .. कुल मिलाकर दिल को सुकून मिल रहा था। गृहस्थी बसाने में ज्यादा समय नहीं लगा जल्दी ही अपने ढर्रे पर चल पड़ी। जबसे आई हूं सोच रही हूं भोपाल आकर जब तक मैं अपनी सहेली वंदना और उसकी प्यारी सी बेटी चिया से न मिल लूंगी, चैन नहीं पड़ेगा। इतने सालों बाद मिलने के लिए बहुत आतुर हो रही थी मैं। एक- दूसरे के हालचाल से ज्यादा यह जानने के लिए बैचेन थी कि बारहवीं के बाद चिया को इंजीनियरिंग ना कराकर कुछ और करने की इजाजत कैसे दे दी। कैसे ऐसा हो सका?


पहली दफा भोपाल पोस्टिंग पर यूं तो हमें सरकारी बंगला मिल रहा था लेकिन हमने एक काॅलोनी में रहना पसंद किया जो मुख्य बाजार के आसपास थी ताकि रोजमर्रा की वस्तुएं आसानी से मिल जाएं। एक दिन शाम को वंदना से मेरी मुलाकात हुई। कुछ देर की बातचीत में लगा जैसे वर्षों पुरानी जान- पहचान हो। इस नितान्त अजनबी शहर में कोई अपना सा लगा। फिर तो हम लगभग रोज ही मिलने लगे। धीरे- धीरे ये दोस्ती कब घने रिश्ते में बदल गई पता ही ना लगा।


मेरा बेटा कबीर और वंदना की बेटी चिया एक ही कक्षा में थे। हमारा कबीर पढ़ाई - खेलकूद दोनों में ही सामान्य था किन्तु चिया मेघावी थी फिर भी वंदना संतुष्ट और खुश ना रह पाती। उसे लगता कक्षा ही नहीं हर क्षेत्र में आगे रहना है। चिया को लेकर वंदना ने कई सपने बुने हुए थे पर एक सपना तो चिया को पूरा करना ही करना था किसी अच्छे नामी इंस्टीट्यूट से इंजीनियरिंग की पढ़ाई। मुझे वंदना के व्यवहार पर अक्सर गुस्सा आता.. .. .चिया कितनी भी मेहनत कर ले, रात- दिन एक कर दे पर वंदना का बोलना नहीं रुकता। ’’कुछ’’ तो कर चिया ’’कुछ’’ तो कर.. .. . फिर झल्लाकर चिया भी कहती यह ’’कुछ’’ की क्या परिभाषा है, इसे कैसे नापते हैं बता देना। दिन-रात दोनों मां- बेटी की नोंक-झोंक चलती ही रहती। चिया की मेहनत जारी रहती और वंदना का लगातार बोलना।


ऐसा भी नहीं है वंदना सिर्फ बोलती ही थी, अपनी भी कई इच्छाएं अरमान उसने अपने से कहीं दूर कर लिए थे घूमने- फिरने ना जाती। यहां तक कि काॅलोनी में होने वाली किटी पार्टी या अन्य गतिविधियों को भी अनदेखा कर देती। बस यही कहती.. . इंजीनियरिंग में एडमीशन के लिए समय पर खाना- पीना व पढ़ना जरूरी है इसलिए सारा दिन चिया को देखने में ही निकल जाता है। एक बार एडमीशन हो जाए फिर सबके साथ मैं भी एन्जाॅय किया करूंगी।


फिर हमारा भोपाल से ट्रांसफर हो गया। इतने सालों बाद अचानक आना हुआ तो मन बीती यादों के जाल में फंसता रहा और एक-एक बीते हुए पल आंखों के आगे आने लगे जैसे कल की ही बात हो। कितनी भी जल्दी कर लो फिर भी नये घर को व्यवस्थित करने में समय लग ही जाता है। आखिरकार वंदना ही मुझसे मिलने आ गई। बोली, रहा नहीं गया तुझसे बिना मिले.. तो मैं आ ही गई। वर्षों बाद दोनों मिले। लग रहा था क्या- क्या बातें कर लें। बातों का कहीं अन्त नहीं था। कबीर व चिया दोनों ही पढ़ाई करने बाहर चले गए थे। वंदना कहने लगी, जब बच्चे हाॅस्टल चले जाते हैं तो घर सांय- सांय करने लगता है। इतना अकेलापन लगता है कि समझ नहीं आता सारा दिन क्या करूं?


हां! सच ही कह रही है, वक्त काटे नहीं कटता पर मैं बहुत उत्सुक हूं जानने के लिए चिया ने इंजीनियरिंग ना कर इंटीरियर डिजाइनिंग का कोर्स कैसे किया और तूने कैसे इजाजत दे दी? ये सब कैसे हुआ मुझे बता.. । तुझे तो पता ही है मेरा व अतुल दोनों का मन चिया को इंजीनियर बनाने का था। पर धीरे-धीरे मुझे यह अहसास होने लगा कि चिया कहती तो कुछ नहीं है पर शायद इसका मन किसी और क्षेत्र में जाने का है। अपने पापा की सोच की वजह से जो मैं अपनी जिन्दगी में ना कर सकी, वो सब चिया से करवाना चाहती थी। चाहती रही कि वह मेरे ही मन का सबकुछ करे।


एक दिन मैं व चिया दोनों यूं ही बैठे थे कि चिया कहने लगी.. . मां लड़की का जन्म लेना अच्छा नहीं होता। ऐसा लगता है जैसे किसी जंजीर में बंधा हुआ है एक छोर उसके पास तथा दूसरा किसी ओर के हाथ होता है। अपनी मन-मरजी का लड़की कुछ नहीं कर पाती। दूसरे की मरजी से जीना ही उसकी नियति बन जाता है। अब आप भी कहां अपने मन का कर पाईं, जैसा नानाजी ने कहा करती गईं, फिर शादी के बाद पापा के अनुसार रहने को आप विवश हो गईं। जैसा उन लोगों ने चाहा आपने अपना जीवन बिताया। ऐसा ही मेरे साथ हो रहा है, आज आपके हाथों में मेरी डोर है कल शायद किसी और के हाथों में होगी।


मां.. .! क्या एक लड़की अपने मन से अपनी जिंदगी नहीं जी सकती? जिन्दगी के कुछ फैसले स्वयं नहीं ले सकती..? सच्चाई में तो अब सब वैसा ही है जैसा वर्षों पहले था। मां, हममें से कोई तो आगे आएगा जो अपनी बेटी- बहन को उसके स्वतंत्र अस्तित्व में जीने देगा। उसकी राह में बाधक नहीं होगा। हम लड़कियों को भी हक है अपने मन की करें, अपने अनुसार इस जिन्दगी को जिएं। पर इसकी पहल किसी ना किसी को तो करनी होगी…।


ये सब सुनकर मैं तो अवाक रह गई। मैंने तो सोचा भी ना था मेरी चिया इतनी समझदार है। इतना कुछ अपने मन में रखे है। मेरा पूरा शरीर सुन्न सा हो गया, लेकिन फिर अगले ही पल चेतना लौटी। सही तो कह रही है..कोई तो आगे आएगा। जैसा बेटियां चाहती हैं उनकी चाहत को पूरा करने उनके वजूद का अहसास कराने।


मैं.. .! हां मैं भी तो इन्हीं में से एक हूं जो अपनी ख्वाहिशों को अपनी बेटी पर थोप रही थी। पर नहीं अब और नहीं.. .. आज से जो चिया चाहेगी, वही होगा उसी की इच्छानुसार जिन्दगी बीतेगी। उसकी चाहत सर्वोपरि होगी। चिया नाम भी तो मैंने ही रखा है अपनी बिटिया को इस खुले आसमान में अपने अरमानों के साथ जी भर कर उड़ने के लिए। आज से मेरी चिया जीवन का हर क्षण अपनी मरजी से जियेगी।


’’मेरी बेटी मेरा अभिमान है, मेरा गौरव मेरी अभिलाषा ।’’ इसकी खुशी में ही हमारी खुशी है। आज मेरी चिया पर कोई जबरदस्ती नहीं हैं बस! फिर चिया ने अपनी रुचि से पहले इंटीरियर डिजाइनिंग किया और अब नेशनल इंस्टीट्यूट आॅफ डिजाइन, अहमदाबाद से पोस्ट ग्रेजुएशन कर रही है। आज मेरी चिया खुश है और मैं उससे भी ज्यादा खुश.. .। अब तो ईश्वर से यही प्रार्थना है वो उड़े... खूब ऊपर तक जाए तथा उसका जीवन खुद के बुने सपनों के इंद्रधनुषी रंगों से सदा- सदा के लिए सरोबार रहें।


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