कहानी - वो मेरी पत्नी है, मगर तुम तो ....तुम हो ...

कहानी - वो मेरी पत्नी है, मगर तुम तो ....तुम हो ...

ये कहानी है पुरुष मानसिकता की, जो प्यार न करते हुए भी अपनी पत्नी को लिव इन रिलेशन में साथ रह रही प्रेमिका को महत्व नहीं देता। उसके लिए लिव इन रिलेशन का यह रिश्ता बस मौज- मस्ती के अलावा एकदम महत्वहीन होता है... यही दिखाती है यह कहानी।


टाटा टेक्सटाइल्स के ब्रांच मैनेजर 'बसंत' के आवास पर होली की पार्टी चल रही थी, टेबलें सजी हुई थीं। उनपर पारदर्शी कांच के ढक्कनों से ढके हुए व्यंजन और पेय पदार्थ रखे हुए थे। सूट-बूट में पुरुष और कमनीय काया का प्रदर्शन करती कम कपड़े पहने युवतियां जगह जगह समूहों में बातचीत में मगन थे। इनमें बस एक युवती हल्के गुलाबी रंग की साड़ी उलटे पल्लू में पहने दिख रही थी और सभी लोगों से मुस्कुरा के अभिवादन कर रही थी। वो गृहस्वामिनी थी, बसंत की पत्नी 'अनुभा', जिससे बसंत को कोई खास मतलब नही था। वो अपने दोस्तों और कार्यालय के सहकर्मियों में ही व्यस्त था।


अब खाने पीने का दौर शुरू हुआ, अनुभा सभी को खाने के बीच में मनुहार करने लगी, "भाईसाहब रसगुल्ला लीजिये न।" कहते हुये रसगुल्ले अनुभा ने  बॉस के आगे कर दिये।


"अरे रसगुल्ला क्या डियर, तुम कहो तो हम जहर भी खा लेंगे।" खीसें निपोरते हुये बॉस ने कहा।


अनुभा बुरी तरह झेंप गई। 


"अरे लाइये न, आप ही खिला दीजिये।" कहकर बॉस ने सहमी हुई अनुभा की कमर पर हाथ रखा।


'चटाक' एक मजबूत हाथ मिस्टर जोसफ के गाल पर पड़ा।


अरे नहीं, अनुभा का नहीं, ये हाथ तो बसंत का था। मिस्टर जोसेफ़ गाल सहलाते हुए बोले, "यू बास्टर्ड, इडियट, आई विल सी यू इन ऑफिस।"


"ऑफिस , माई फुट। आई एम रिजाइनिंग जस्ट नाउ। गैट लॉस्ट योरसेल्फ फ्रॉम हेयर।"


और पलटकर अनुभा को कहा, “गवांर कहीं की, एक काम ठीक से नहीं होता।” अनुभा चुपचाप अंदर चली गई।


शुचि जो अब तक मूकदर्शक थी, बसंत को एक गिलास पानी देते हुए बोली, "काम डाउन बसंत।"


शुचि को बसंत का हीरो वाला बिंदास कलेवर बड़ा अच्छा लगा।


कुछ दिन बाद, बसंत और शुचि एक मॉल में मिले।


शुचि ने अनुभा के बारे में पूछा, तो बसंत ने कहा, "वो मां- पिताजी की पसंद है। मेरे लेवल की है ही नहीं। मुझे तो तुम्हारे जैसी लड़कियां पसंद हैं।" अनायास ही बसंत के मुंह से निकल गया।


जवाब में शुचि मुस्कुरा दी।


अब उनके मिलने का सिलसिला शुरू हो गया, जो धीरे धीरे प्यार में बदल गया।


आखिर छह महीनों में ही बसंत ने शुचि के साथ रहने का फैसला कर लिया जिसे अनुभा ने पुरनम आंखों से स्वीकार कर लिया।


शुचि और बसन्त तीन महीने से लिव इन रिलेशन में थे और बहुत खुश भी थे, पर आज ........


शुचि कुछ भी सुनने के लिये तैयार ही नहीं थी। बस बसन्त पर बरसे ही जा  रही थी।


बस आरोप पर आरोप लगाये जा रही थी, "आज शाम जब बॉस ने क्रिसमस पार्टी में मुझसे बदतमीजी की, तब तुमने विरोध क्यों नही किया"?


"अरे तुम तो वहां ऐसे ड्रिंक कर रहे थे, जैसे मुझे जानते ही नहीं"।


"अरे वो बॉस थे शुचि, कोई ऐरा- गैरा नहीं!"


"तो ......होली की शाम भी बॉस ही थे, जिनसे तुम उलझ पड़े थे और वो भी सिर्फ इसलिये कि उन्होंने अनुभा को डियर बोला था। यहाँ तक कि तुमने उसके यहाँ  रिजाइन तक कर दिया।"


"हां, तो?"


"जबकि  तुम कहते हो कि अनुभा को प्यार तो क्या पसन्द भी नही करते। और वो कहीं से भी तुम्हारे स्तर की नहीं है।


"याद है न कि तुमने ही कहा था मुझे।"


"हां हनी, पर...........मैं..."


"और मुझे तो इतना प्यार करते हो......इतना चाहते हो कि जान भी दे सकते हो।"


"हां यार..चाहता हूं, म करता हूं तुमसे और मौका आने पर साबित भी कर दूंगा...."


"ओके, फिर आज जब बॉस इतना टची हो रहा था तब.....तब तुम्हारा खून क्यों सफेद हो गया था?


तुम क्यों चुप थे....बोलो...?"


"शुचि,तुम समझो यार बात को......देखो मैं भले अनुभा को प्यार नही करता पर वो पत्नी है मेरी और..."


"और.....और मैं?"


"बोलो चुप क्यों हो बसन्त....और मैं? मैं कौन हूं?"


"तुम!... बस तुम हो...."


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