#मेरा पहला प्यार- इश्क जो मुकम्मल न हो सका

#मेरा पहला प्यार- इश्क जो मुकम्मल न हो सका

ज़िन्दगी में हमें बहुत से रिश्ते ऊपर वाले से बिन मांगे ही मिल जाते है। जैसे माता-पिता, भाई-बहन और करीबी रिश्तेदार। मगर इन सब के बीच प्यार एक ऐसा रिश्ता होता है जो हम खुद बनाते हैं। समाज में इस रिश्ते का कोई नाम नहीं होता लेकिन फिर भी ये रिश्ता अनमोल होता है। राधा-कृष्ण का प्यार भी तो कुछ ऐसा ही था। यूं तो कृष्ण की शादी रुक्मणि से हो गई लेकिन उसके बाद भी सदियों से कृष्ण का नाम राधा के साथ ही लिया जाता है, उन्हें एक साथ ही पूजा जाता है। देखा जाये तो उनका प्यार अधूरा होकर भी पूरा है। इसी को तो कहते है सच्चा प्यार। हमारी आज की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। जिसे भेजा है जयपुर से फरहान ने। जिनका इश्क मुकम्मल तो न हो सका मगर उसके बाद भी वो ज़िंदा है फरहान और उस लड़की के दिल में जिन्होंने कभी ज़िन्दगी साथ बिताने के वादे किये थे। आइए जानते हैं कि फरहान के अधूरे इश्क की कहानी खुद इन्हीं की ज़ुबानी।   


"मुझे आज भी याद है वो दिन जब मैंने उसे पहली बार कॉलेज में देखा था। बात बस एक नज़र से शुरू हुई और सीधा दिल तक जा पहुंची। उससे यूं नज़र का मिलना ऐसा था मानो वक़्त वही थम गया हो। मैं कॉलेज की नेतागीरी करने वाला लड़का और वो हंसमुख मिज़ाज की पढ़ाई करने वाली लड़की। कई दिन देखने के बाद आखिरकार एक दिन मैंने उसे रोक ही लिया। वो डरी-सहमी सी अपने दोस्तों के साथ रुक गई। मैं बोल पड़ा, आपका नाम क्या है उसने बहुत ही धीमी आवाज़ में अपना नाम बताया। स्वाति नाम था उसका। मैंने कहा मेरा नाम फ़रहान है, क्या आप मुझसे दोस्ती करेंगी? डर के मारे वो 'ओके' बोल कर भाग गई। फिर अगले दिन मैं उसके पास जा कर बैठ गया और उससे बातें करने लगा। मैंने उसे अपने बारे में बताया। धीरे धीरे उसके मन में मेरे लिए जो डर था वो ख़तम होने लगा। जिसके बाद हमने अपने फ़ोन नम्बर एक्सचेंज कर लिए।


कुछ ही महीनो में हम अच्छे दोस्त बन गए। अब वो अपने दिल की हर बात मुझसे शेयर करने लगी। मुझे न जाने कब उससे इश्क हो गया। एक दिन हिम्मत करके मैंने उसके सामने अपने इश्क का इज़हार कर दिया। एक पल के लिए उसको लगा मैं मज़ाक कर रहा हूं लेकिन जब उसने मेरी आंखो से बहते आंसुओं को देखा तो वो ख़ामोश हो गई और ख़ुद भी रोने लगी। उस वक़्त ऐसा लगा मानो मुझसे बहुत बड़ी ग़लती हो गई हो। वो क्लास से रोते हुए कॉलेज के बाहर भाग गई और अपने घर चली गई।


एक हफ़्ते तक ना कोई मेसेज ना कोई कॉल। मुझे लगा जैसे मैंने अपना प्यार और अपनी दोस्ती दोनों ही खो दी। फिर एक दिन उसका फ़ोन आया। उधर से आवाज़ आई साॅरी। मैंने कहा सॉरी तो मुझे बोलना चाहिए। मैं वादा करता हूं की आज के बाद कभी ये प्यार-व्यार की बातें नहीं करूंगा और हमेशा तुम्हारा दोस्त बनकर रहूंगा। अगले दिन सब पहले की तरह नॉर्मल हो गया। फिर से वही दोस्ती, हंसी-मज़ाक। इसी बीच उसकी छोटी बहन ने मुझे बताया की स्वाति आपसे बहुत प्यार करती है लेकिन वो ये बात आपसे कभी नहीं कहेगी। क्योंकि घर में हिन्दु-मुस्लिम की शादी के लिए कोई नहीं मानेगा। वो कभी कुछ नहीं कहेगी लेकिन आपके लिये रोती बहुत है। उस दिन मानो मुझे मेरी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी ख़ुशी मिल गई। अगले दिन मैंने उससे पूछ ही लिया, सच-सच बताओ क्या तुम मुझसे प्यार करती हो। इस बार वो झूठ ना बोल पाई और हां बोल दिया।


उस दिन मानो मैं हवा में उड़ने लगा और मुझे सारी ख़ुशी मिल गई। हम दोनों के प्यार का सिलसिला चल पड़ा। देखते ही देखते 3 साल पूरे हो गए और कॉलेज का आखरी दिन आ गया। एग्जाम तो ओवर हो गया मगर वो अपनी क्लास से बाहर नहीं निकली। मैंने अंदर जाकर देखा तो वो बैठी रो रही थी। उसे रोता देख मुझे भी रोना आ गया।  हम दोनों जानते थे कि अब हमारा रोज़-रोज़ मिलना आसान नहीं होगा। थोड़ी देर बाद वो घर चली गयी और मैं पीछे से सिर्फ उसे देखता रह गया। मगर ऊपर वाले ने मानो हमारी दुआ कबूल कर ली उसका एडमिशन दिल्ली के एक एम. बी. ए. कॉलेज में हो गया और मेरी भी नौकरी दिल्ली में लग गयी। हम फिर साथ मिलने लगे, समय बिताने लगे। अब हमने सोच लिया था कि चाहे कुछ भी हो जाये हम अपने रिश्ते के बारे में घर वालों को बता देंगे।


स्वाति ने अपने घरवालों को सब बता दिया। बस फिर क्या था घर वालों ने उसी वक़्त उसको घर में क़ैद कर मोबाइल पैसे सब छीन लिए। कई दिनों तक उसका कोई फोन या मेसेज नहीं आया। फिर अचानक एक दिन उसने अपने पापा के फ़ोन से कॉल करके बताया कि अगर मैंने तुमसे शादी की तो पापा मेरी मां को मार देंगे। उस वक़्त मेरे मुंह से कुछ नहीं निकला और वो सिर्फ़ माफ़ी मांगती रही। जिस तकलीफ में वो थी उसे मैं समझ सकता था।


कुछ समय बाद उसकी शादी लखनऊ में हो गई। शादी के 3 महीने ही हुए थे कि उसके पति का एक भयानक ऐक्सिडेंट हो गया। जिसमें उसके पति का पूरा फेस डैमेज हो गया और एक आंख चली गई। उसको देखने मैं लखनऊ गया। जैसे ही हॉस्पिटल में अंदर गया मैंने देखा वो सामने खड़ी थी, बेबस सी। मुझे देखकर तो मानों उसके आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। मैं उसे गले लगा कर उसके आंसुओं को पोछना चाहता था मगर अब उसपर मेरा कोई हक़ नहीं रह गया था।


धीरे धीरे उसके पति की तबियत ठीक होने लगी। आज भी अक्सर जब बहुत ज्यादा परेशान होती है तो मुझे फ़ोन करके बिना कुछ बोले सिर्फ़ रोती है और जब दिल हल्का हो जाता है तो बाद में बात करती हूं कहकर फ़ोन रख देती है। हमारे प्यार में कभी कोई शर्त नहीं रही, कोई स्वार्थ नहीं रहा। हम एक दूसरे का हर ज़रूरत के समय में साथ देते है और यही सोचते हैं कि हमारा इश्क मुकम्मल न हो सका तो क्या हुआ हमने उसके बाद भी हर कदम पर एक दुसरे का साथ निभाया है और निभाते रहेंगे।


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