भारतीय संगीत को बढ़ावा देने के लिए “ज़ुबान” ने की “पहली पहल” की शुरूआत

भारतीय संगीत को बढ़ावा देने के लिए “ज़ुबान” ने की “पहली पहल” की शुरूआत

क्या आपने कभी सोचा है कि हिंदी संगीत का अस्तित्व हमारे देश या दुनिया में क्या है? सिर्फ बॉलीवुड से ही हिंदी संगीत का अस्तित्व मौजूद है। इसके अलावा कुछेक बैंड भी हैं जो हिंदी में गीत-संगीत को कुछ तवज्जो दे रहे हैं। अगर बॉलीवुड में संगीत नहीं होता तो हिंदी संगीत का नामोनिशान तक नहीं होता। यह बात आपने तो आज तक नहीं सोची, लेकिन एक ग्रुप - ज़ुबान ने भारतीय संगीत को बढ़ावा देने के बारे में सोचा और कुछ नया करने की ठानी।


यही नई शुरूआत - “पहली पहल” 10 वीडियो गीतों का एक कलेक्शन होगा जिसे देश के अलग-अलग हिस्सों के 10 अलग-अलग आर्टिस्ट द्वारा परफॉर्म किया जाएगा। इस कलेक्शन का हर गीत ज़ुबान का हिस्सा रहे बहुत से म्यूजिक आर्टिस्ट्स के साझा प्रयास का परिणाम होगा। खास बात यह कि “पहली पहल” एक म्यूज़िकल वेब सिरीज़ होगी, ताकि जल्द से जल्द यह संदेश लोगों तक पहुंच सके। इस प्रोजेक्ट के लिए विशबेरी के माध्यम से 5.50 लाख का फंड जुटाने की कोशिश की जा रही है। इसके साथ ही कुछ नये इंस्ट्रूमेंट्स के लिए भी इनीशिएटिव लिया जा रहा है।


पहली पहल की शुरूआत


इस प्रोजेक्ट की शुरूआत वर्ष 2016 में हुई एक जागृति यात्रा के साथ हुई। ज़ुबान की शुरूआत कवीश सेठ और नेहा अरोरा ने बॉलीवुड के अलावा हिंदी संगीत का अस्तित्व और हिंदी और देश की अन्य बोलियों में देसी संगीत को बढ़ावा देने के लिए की थी। कवीश और नेहा दोनों का ही एजुकेशन बैकग्राउंड संगीत नहीं, कुछ और ही है। कवीश ने आईआईटी बॉम्बे से एमएससी केमिस्ट्री में की है, जबकि नेहा अरोरा ने भी इंजीनियरिंग और एमबीए किया हुआ है।


Kavish


मुंबई के कवीश सेठ एक गायक और गीतकार होने के साथ एक कंपोज़र भी हैं। उनके गीत ज्यादातर हिंदी या उर्दू में ही होते हैं। अब तक वे अपने गिटार और खुद डिज़ाइन किये गये एक इंस्ट्रूमेंट- नूरी के साथ देश के अनेक हिस्सों में अपने गीतों की परफॉर्मेंस दे चुके हैं। उन्हें अपनी परफॉर्मेंस के दौरान बीच-बीच में कविताएं करने के लिए खासतौर पर जाना जाता है।


नेहा का सवाल है कि देश में 22 ऑफिशियल भाषाएं हैं और 720 बोलियां हैं और इन सबका अलग और मनभावन संगीत भी है। इसके बावजूद हम ज्यादातर समय बॉलीवुड म्यूजिक ही क्यों सुनते हैं? नेहा का कहना है कि बहुत से क्षेत्रीय सर्कल्स हैं, जिन्हें आपस में जोड़ने और बढ़ावा देने की जरूरत है। हमारा यानी ज़ुबान का पहला कदम यह था कि कई जगह हमने कई कलाकारों को जोड़कर कुछ स्क्रैप वीडियो तैयार किये। हम तो सिर्फ प्लेटफॉर्म दे रहे हैं। सिर्फ एक आइडिया को प्रमोट कर रहे हैं। हम दिखाना चाहते हैं कि इसमें क्या अलग है।


योजना और उद्देश्य


इस ग्रुप की 7 भारतीय भाषाओं, जिनमें हिंदी, उर्दू, भोजपुरी, उड़िया, बांगला, कोली और संस्कृत शामिल हैं, में क्षेत्र विशेष में जाकर क्षेत्रीय संगीत के वीडियो तैयार करने की योजना है। इस पहल का उद्देश्य क्षेत्र के संगीतज्ञों को एक डिजिटल प्लेटफॉर्म देकर उनकी मदद करने के अलावा डिजिटल मीडिया के माध्यम से बड़ी ऑडिएंस तक पहुंच बनाना है।


वाराणसी एपिसोड 

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अभी इस ग्रुप ने कुछ स्क्रैच वीडियो तैयार किये हैं, जिनको दिखाकर धनराशि जुटाने की योजना है, फंड मिलने के बाद उचित लोकेशन पर जाकर खास आर्टिस्ट की परफॉर्मेंस को अच्छी तरह से शूट करके वीडियो बनाए जाएंगे जो क्षेत्रीय संगीत को बढ़ावा देने में खासे प्रभावी साबित होंगे। 10 अलग जगहों के आर्टिस्ट्स को आगे लाने के लिए 10 अलग- अलग गीत रिकॉर्ड किये जाएंगे, क्योंकि डिजिटल नेटवर्क तक नहीं पहुंचने से ही बहुत से लोगों तक यह म्यूजिक और मैसेज पहुंचेगा।


उड़ीसा एपिसोड

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पहली पहल के कलाकार


कवीश सेठ के अलावा पहली पहल के 10 आर्टिस्ट्स में मुंबई के कनिष्क सेठ हैं जो इंडी इलैक्ट्रॉनिक म्यूजिक कंपोजर और प्रोड्यूसर हैं। वे “ट्रांस विद खुसरो” के नाम से पहले भी एक म्यूजिक एलबम रिलीज कर चुके हैं, जिसे काफी सराहना मिली थी।  भुवनेश्वर के सोशल एक्टिविस्ट और पूर्व सरपंच बिस्वा मोहंती म्यूजिक टीचर होने के साथ-साथ गायक और गीतकार भी हैं। मुंबई के चिंतामणि शिवाडीकर कोली गायक और गीतकार हैं। वो बचपन से कोली गीत गा रहे हैं और अब अपने विशेष स्टाइल के लिए जाने जाते हैं। कोलकाता के सोहम पाल भी इंडिपेंडेंट सिंगर और गीतकार हैं, जिनके दोतारा और खामक (बंगाल के फोक इंस्ट्रूमेंट्स) बंगाल के फोक म्यूज़िक से काफी प्रभावित हैं। वे कलिमपोंग के वर्नमाला परिवार और कोलकाता के निर्बयाज़ बैंड के साथ भी काम करते हैं।


Zubaan


इसी तरह वाराणसी के राघवेंद्र कुमार नारायण हैं, जिन्होंने मात्र 10 साल की उम्र से ही अपने गुरु डॉ. संजय वर्मा से वीणा बजाना सीखा। उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से सितार में भी स्नातकोत्तर किया है। वे अब तक अनेक महोत्सवों का हिस्सा बने और कई पुरस्कार भी पा चुके हैं। विवेक बडोनी देहरादून के निवासी हैं जो हिंदी और  गढ़वाली में गीत लिखते हैं। वे गिटार और कीबोर्ड भी बजाते हैं। सूफी संगीत से प्रभावित विवेक अर्बन फोक कलेक्टिव माथू रे ड्रीमहाउस और म्यूज़िक ग्रुप भैरवाज़ का भी हिस्सा रहे हैं।


संतोष पांडा उत्तराखंड के कौसानी के निवासी हैं जो ज़ुबान का हिस्सा रहे हैं और वे भगवद पुराण एक खास अंदाज़ में गाते हैं। चंदन तिवारी झारखंड की राजधानी रांची की हैं जो एक भोजपुरी कल्चरल संगठन- आखर से संबंध रखती हैं। वे भोजपुरी में अनजाने कवियों द्वारा लिखे हुए गीतों को इतनी तन्मयता से गाती हैं, कि सुनने वाले मदमस्त हो जाते हैं। उत्तर प्रदेश के बलिया के रहने वाले शैलेन्द्र मिश्रा भी भोजपुरी लोक संगीत को अपने ग्रुप आखर की ओर से बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं। वे समय-समय पर भोजपुरी संगीत में प्रयोग भी करते रहते हैं और नये गीतों की रचना भी करते हैं। इसी वजह से संस्कृति मंत्रालय की ओर से उन्हें एचआरडी स्कॉलरशिप भी मिल चुका है।


भारतीय संगीत को बढ़ावा देने वाले इस प्रोजेक्ट को सफल होने में अपना भी हाथ बढ़ाएं और यहां क्लिक करके पहली पहल को सपोर्ट करें।